ज़िंदगी का मोल

मुद्दतें बीत जाती है ये सोचने में कि ज़िंदगी तेरा मोल क्या है?

यूँ ही बेवज़ह खो देते है हम वो अनमोल पल जिसमें सारा संसार बसा है।

क्यूँ है हम पाबंदियों के मोहताज़ तेरे अक़्स से रुबरु होने के लिए?

ये तो सबसे अच्छा मौका है, खुद को साबित करने का कि कैसे जिया जाता है इंसानियत के लिए।

हमारी एक छोटी सी सावधानी, लाखों ज़िन्दगियों को सुरक्षित कर सकती है।

घर पर रहिए, सजग रहिए और जागरूक रहिए,

अभी यही सबसे बड़ी राष्ट्र सेवा हो सकती है।

नोट– इस समय सबको अभी ज़िम्मेदारी और भागीदारी को समझना चाहिए।

©®दीपिका

मैं आशा!

हँसती और मुस्कुराती, मैं आशा हूँ।

निराशा को दूर भगाती और सबकी हिम्मत बढ़ाती, मैं आशा हूँ।

खड़ी हूँ यही चौखट पर तुम्हारी,

बस बंद दरवाज़े खोलने की देर है।

सोच रहे हो क्या तुम, किस उधेड़बुन में हो?

दोस्त तो बनो मेरे एक बार, किस आशंका में हो?

गर एक बार थामा मेरा दामन,

तो मैं जीवन भर साथ नहीं छोडूँगी।

चलूंगी संग संग तेरे, सपनों को उड़ान दूँगी।

गर गिर रहा होगा तो संभाल लूंगी।

और फिर से उठने का हौंसला दूँगी।

हँसती और मुस्कुराती, मैं आशा हूँ।

निराशा को दूर भगाती और सबकी हिम्मत बढ़ाती, मैं आशा हूँ।

©®दीपिका

कोशिशें

साँसें चल रही है तो उम्मीद अभी भी बाकी है।
हारी नहीं हूँ मैं, कोशिश अभी भी जारी है।

माना कि मुश्किलों भरी है राह मेरी और तूफानों का दौर है,
पर ढिगा नहीं है विश्वास मेरा, जंग अभी भी जारी है।

फिर उठूँगी गिर कर भी मैं, लड़खड़ाते क़दमों से भी,
कोई हो ना हो साथ मेरे पर ज़िन्दगानी अभी भी बाकी है।

भले ही जल गई हो लकड़ियाँ मेरे चूल्हे की,
पर उनकी राख अभी भी बाकी है।

जख्म हरे कर जाते है कुछ घाव पुराने भी,
आँखों में नमी हो भले ही पर होठों पर मुस्कान अभी भी बाकी है।

©®दीपिका

सुनिये पॉडकास्ट पर!

https://anchor.fm/deepika-mishra/episodes/Umeed-Abhi-Bhi-Baki-Hai-ebf502

बराबरी का दावा

हम औरतें क्यूँ हक दे देती है किसी और को खुद पे सवाल उठाने का। जब एक आदमी सम्पूर्ण हो सकता है अपनी खामियों के साथ तो एक औरत क्यूँ नहीं?

हम खुद अपनी बराबरी का दावा कम दे देते है खुद की कमियों को बड़ा मानकर। खुद को परफ़ेक्ट दिखाने की हौड़ में शामिल होकर। हमने ही शुरू की है ये दौड़ शायद।बिना रुके लगातार दौड़ते रहने की आदत।

शिखा डिप्रेशन में चली गई रही आयुष को जन्म देने के बाद। उसके माँ बनते ही परिवार की तरफ़ से ढेरों हिदायतें आने लगी थी और ताने भी कि तुम्हें ये भी नहीं आता,वो भी नहीं सिखाया तुम्हारी माँ ने।

हमने भी सब अकेले ही संभाला था कोई नहीं था हमें भी बताने वाला। शिखा को लगता था कि वो ही बस माँ बनी है, शेखर तो बाप बने ही नहीं, क्यूँ उन्हें नहीं कोई समझाता कि उन्हें भी अब बहुत कुछ बदलना होगा।

ये शिखा की ही नहीं उन हज़ारों लाखों औरतों की कहानी है जो पहली बार माँ बनती है। पूरी ज़िंदगी 360° घूम जाती है और शिकार हो जाती है निराशा का।

बात यहाँ पर माँ बनने की ही नहीं है और भी कई ऐसे पहलू है जिसमें हम औरतें दूसरों की ऐनक से देखे जाने लगते है।

क्यूँ हम औरतें विश्वास नहीं करती खुद की क़ाबिलियत पर और हार मान लेती है अगर कोई सवाल उठा देता है कि तुम्हें ये नहीं करने आता एक औरत होकर या तुम एक अच्छी माँ नहीं हो, या अच्छी बीवी नहीं हो वगैरह वगैरह जबकि कि हमें पता है कि हम है, हमने वो सब भी किया है जो हमें आता तक भी नहीं था या जिसके बारे में सोचा तक नहीं था। तो कैसे कम हो सकते है हम?

कोई बात नहीं है अगर परफ़ेक्ट नहीं है, हम भी एक इंसान ही है हाड़ मांस का शरीर, कोई मशीन नहीं, कोई कठपुतली नहीं, जिसकी डोर हमेशा दूसरे के हाथ में हो। हमें भी उड़ना पसंद है, अपनी मर्ज़ी से जीना पसंद है पर अगर हम अपनी इच्छाओं को बाज़ू रख परिवार को पहला दर्ज़ा देते है या नहीं भी देते है तो इससे कुछ नहीं बदलना चाहिए हमारी परिभाषा में।

और बदलता भी है तो अब मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्यूंकि मैंने खुद को बराबरी का दर्ज़ा दिया है। मैनें अपने पंखों को खुद उड़ने का हौंसला दिया है।
मैंने खुद को बराबरी का हक़ दिया है। मैं खुद को स्वीकार करती हूँ मैं जैसी भी हूँ, किसी और की तारीफ़ों की मोहताज़ नहीं, मैं खुद में सक्षम हूँ, दिल छोटा नहीं करती अगर नहीं खरी उतर पाती दूसरों की अपेक्षाओं पर।

मैंने उड़ना सीख लिया है, खुद को खुद से जोड़ लिया है।मिले ना मिले तवज़्ज़ो मेरी ख्वाहिशों को, मैंने खुद अपनी तस्वीर में रंग भरना सीख लिया है।

©®दीपिका

तन्हाईयाँ

भरी भीड़ में भी जो तन्हाईयाँ ढूंढ़ता है, वो मेरा अक़्स ही तो है जो एक मनपसंद आईना ढूंढ़ता है।

शायद उसको आदत हो गई है खुद ही कहकर खुद ही सुनने की,पर फिर भी हर दूसरे पल आहट पर बंद दरवाजा खोलता है।

भरी भीड़ में भी जो तन्हाईयाँ ढूंढ़ता है, वो मेरा अक़्स ही तो है जो एक मनपसंद आईना ढूंढ़ता है।

वो क्या समझेगा गुमनामी को उसकी?जो खुद गुमशुदा होकर अपना नाम पता पूछता है।

भरी भीड़ में भी जो तन्हाईयाँ ढूंढ़ता है, वो मेरा अक़्स ही तो है जो एक मनपसंद आईना ढूंढ़ता है।

चाहत को उसकी समझना इतना भी आसां नहीं है। जो ना आँखों से, ना ही शब्दों से अपना गम बयां करता है।

भरी भीड़ में भी जो तन्हाईयाँ ढूंढ़ता है, वो मेरा अक़्स ही तो है जो एक मनपसंद आईना ढूंढ़ता है।

©®दीपिका

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