जंग दिल और दिमाग की!

ये जंग है दिल और दिमाग की, देखते है कि आखिर कौन जीतता है?

दिल और दिमाग के बीच कुछ मुद्दों को लेकर फर्क़ साफ़ साफ़ दिखाई देता है।

दिल बड़ी साफ़ गोही से सब कुछ कह देना चाहता है,

पर ये दिमाग है ना, बड़ा शातिर है, गोल गोल घुमाते रहना चाहता है।

लोग कहते है कि दिल से लिए फैसले अक्सर सही नहीं होते,

जो उठाते है फ़ायदा आपकी भावनाओं का, वो कतई विश्वास करने लायक नहीं होते।

कुछ ऐसे भी होते है जो हर चीज़ को दिमाग के तराजू से तोलते है,

अगर लगता है फायदे का सौदा तो ही किसी रिश्ते में आगे बढ़ते है।

ये जंग है दिल और दिमाग की, देखते है कि आखिर कौन जीतता है?

दिल और दिमाग के बीच कुछ मुद्दों को लेकर फर्क़ साफ़ साफ़ दिखता है।

मेरी नज़र में रिश्ते दिल से निभाए जाते है, ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत होती नहीं है।

गर महसूस कर सकते हो तकलीफ़ उसकी भी तो यही सच्ची कसौटी है।

कुछ रिश्तों को वक़्त के हवाले कर देना ही समझदारी होती है।

अगर अपने है तो लौट कर आएंगे वरना इंतज़ार करते करना एक मज़बूरी बन जाती है।

ये जंग है दिल और दिमाग की, देखते है कि आखिर कौन जीतता है?

दिल और दिमाग के बीच कुछ मुद्दों को लेकर फर्क़ साफ़ साफ़ दिखता है।

©® दीपिका

इंतज़ार अच्छे वक़्त का!

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/10/intezaar-acche-waqt-ka/

हज़ारों बहाने जीने के!

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/09/hazaro-bahane-hai-jeene-ke/

इंतज़ार अच्छे वक़्त का!

हम अच्छे वक़्त का इंतज़ार ही करते रहते जाते है,

कुछ पीछे छूट जाता है तो कुछ हम खुद छोड़ के आगे बढ़ जाते है।

ऐसा कर के कभी खुद को धोखा देते है,तो कभी किसी और से धोखा पाते है।

और फिर एक बार हम अच्छे वक़्त का इंतज़ार ही करते रह जाते है।

समय का पहिया गतिमान है किसी के लिए नहीं रुकता है,

हमें ही समझनी होती है उसकी गति और खुद ही सामंजस्य बिठाना पड़ता है।

गलती हमारी होती है और हम दूसरों पर दोष मढ़ते रह जाते है,

और हम फिर यूँ ही हाथ पर हाथ रखकर अच्छे वक़्त का इंतज़ार ही करते रह जाते है।

समय रहते ही चीजों को सुधारने की कोशिश की होती तो शायद नज़ारे कुछ और होते।

हमारे भी परिश्रम और सफलताओं के किस्से चहुँ ओर होते।

अच्छे वक़्त का इंतज़ार नहीं, अच्छा वक्त खुद के लिए कमाना पड़ता है।

खुद को हर उस हारी हुई सोच से ऊपर उठाकर जीत के क़ाबिल बनाना पड़ता है।

वरना हम अच्छे वक़्त का इंतज़ार ही करते रहते जाते है,

कुछ पीछे छूट जाता है तो कुछ हम खुद छोड़ के आगे बढ़ जाते है।

©®दीपिका

हज़ारों बहाने है जीने के!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/09/hazaro-bahane-hai-jeene-ke/

गमों के बादल!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/08/gamo-ke-baadal/

वो एक फ़रिश्ता!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/06/vo-ek-pharista/

इंसानियत कुछ खो सी गई है!

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/06/insaaniyat-jo-kuch-kho-si-gayi-hai/

पॉडकास्ट सुने।

https://anchor.fm/deepika-mishra

गमों के बादल!

कैसे है आप सभी लोग? आशा करती हूं कि आप सभी लोग सकुशल अपने परिवार के साथ सुरक्षित होंगे।

चलिए “बातें कुछ अनकही सी,” के किस्से को आगे बढ़ाते है।

आज की कविता उस आशा के नाम, जिसका दीपक हम सभी के दिलों में जल रहा है। ज़ाहिर है कठिन वक्त है पर हौंसला नहीं खोना है।

गमों के बादल!

गमों के बादल छंट ही जाएंगे और फिर से रोशनी का नया सूरज निकलेगा।

फिर से खिल उठेगा आँगन, महकते फूलों की खुशबूओं से, फिर से ये वीराना चमन बनेगा।

आएंगे फिर से खुशियों के मौसम और फिर से कोई पगला दीवाना बनेगा।

सच है कि आसां नहीं होता, मायूँसियों के भँवर से बाहर निकलना,

पर ये भी सच है कि आशा की सिर्फ एक किरण से गमों का अंधेरा दूर भगेगा।

फिर से खिल उठेगा आँगन, महकते फूलों की खुशबूओं से, फिर से ये वीराना चमन बनेगा।

छोटी सी ही तो है ये ज़िन्दगानी, पता नहीं कब कौन आएगा और कब कौन चला जाएगा?

तो अच्छा है जब पता है इतनी बात, तो ये समझना और भी आसां हो जाएगा।

अगर साथ हो अपनों का तो हर मुश्किल का सामना करना आसां हो जाएगा।

पर गर हो अकेले तुम राहों में तो गम नहीं, खुद तेरा हौंसला ही तुझे राह दिखाएगा।

फिर से खिल उठेगा आँगन, महकते फूलों की खुशबूओं से, फिर से ये वीराना चमन बनेगा।

©® दीपिका

आशा करती हूं कि इस कविता ने थोड़ी सकारात्मकता जरूर दी होगी।

वो एक फ़रिश्ता!

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/06/vo-ek-pharista/

इंसानियत जो कुछ खो सी गई है!

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/06/insaaniyat-jo-kuch-kho-si-gayi-hai/

और भी दर्द है ज़माने में!

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/04/aur-bhi-dard-hai-is-zamane-main/

पॉडकास्ट सुने।https://anchor.fm/deepika-mishra/episodes/Umeed-Abhi-Bhi-Baki-Hai-ebf502

वो एक फ़रिश्ता!

क्या होती है परिभाषा एक फ़रिश्ते की?

आज की कविता इसी सवाल के नाम।

स्वागत करती हूँ आप सभी लोगों का एक बार फिर से “बातें कुछ अनकही सी” के अगले भाग में जहाँ आज खोज जारी है उस फ़रिश्ते की जिसे मैंने कल देखा था।

वो एक फ़रिश्ता!

कल देखा था मैंने एक फ़रिश्ता,

जो कि चिड़ियों को दाना चुगा रहा था,

प्यासों को पानी पिला रहा था और भूखों को खाना खिला रहा था।

चेहरे पर उसके तेज़ था जैसे कई सूरज मिलकर अपनी आभा बिखेर रहे हो।

अपने आशियानों से निकल कर किसी और का जीवन बदल रहे हो।

देखा तो लगा कि क्यूँ मैं भी ये नहीं कर सकती,किसी की आँखों का सपना और किसी की आत्मा को तृप्त क्यूँ नहीं कर सकती।

कल देखा था मैंने एक फ़रिश्ता,

जो कि चिड़ियों को दाना चुगा रहा था,

प्यासों को पानी पिला रहा था और भूखों को खाना खिला रहा था।

इससे बड़ी एक फ़रिश्ते की पहचान क्या हो सकती है!

जिसकी खुद की चादर फटी हो, जिसका खुद का पेट खाली हो,

पर ख़्वाहिश कितनों का तन ढ़कने की और उनका पेट भरने की हो।

तो सच में देव पुरुष है उपाधि का अधिकारी है।

कब कौन समझे तेरी भावनाओं को जो कहते तुझे कि अरे! ये तो खुद भिखारी है।

कल देखा था मैंने एक फ़रिश्ता,

जो कि चिड़ियों को दाना चुगा रहा था,प्यासों को पानी पिला रहा था और भूखों को खाना खिला रहा था।

©®दीपिका

इंसानियत जो कुछ खो सी गई है।

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/06/insaaniyat-jo-kuch-kho-si-gayi-hai/

और भी दर्द है इस ज़माने में!

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/04/aur-bhi-dard-hai-is-zamane-main/

चलो फिर से शुरू करते है!

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/03/chalo-phir-se-shuru-karte-hai/

पॉडकास्ट सुने।

https://anchor.fm/deepika-mishra/episodes/Koshishe-ecedbp

इंसानियत जो कुछ खो सी गई है।

स्वागत है आप सभी लोगों का “बातें कुछ अनकही सी” के पाँचवे भाग में जहाँ आज हम बात करेगें मानवता की, इंसानियत की, जो आजकल कुछ खोई हुई सी लगती है। पूरी तरह से तो नहीं क्यूँकि कुछ लोग है जो कि आज भी रोशनी का दिया जलाए हुए है।और आशाओं की किरणें बिखेर रहे है।

आशा करती हूँ कि ये उजाला सब जगह फैले और हम फिर से अपनी जड़ों से जुड़े।

इंसानियत जो कुछ खो सी गई है

कहाँ ढूंढू इसे, क्यूँ थोड़ी रूठी हुई सी है।

कभी सज़दे तो कभी किसी की दुआओं में अक़्सर मिल जाया करती थी मुझे।

पता नहीं क्यूँ अब लाख ढूढंने पर भी दिखती नहीं है मुझे।

ऐसा तो नहीं है कि रहबरों की कमी है इस “महफ़िल ए दुनिया” में,

पर जो पहले घर घर थी क्यूँ अब कुछ चंद ठिकानों पर ही टिक गई है।

इंसानियत जो कुछ खो सी गई है, कहाँ ढूंढू इसे, क्यूँ थोड़ी रूठ सी गई है

इंसान को उसकी इंसानियत से ही पहचाना जाता है, दूसरे चोले तो औरों के भी पास मिलेंगे।

ये रहमत ख़ुदा की है जो खुद की पहचान में खुद से मिलने की वज़ह बनेगें।

मुश्किल कोई नहीं है, शायद बस थोड़ा रास्ता भटक गए है।

भागते भागते कुछ चंद चीज़ों के पीछे इंसानी खूबसूरती को भूल गए है।

ये गहना है, श्रृंगार है इंसानों का, जो उसे खुद से जोड़ कर रखता है,

वरना तो कब के बिख़र गए होते हम, अगर इंसानियत का सहारा नहीं मिला होता।

अगर है वो खूबी तो क्यूँ जाऱ जाऱ सी हो गई है।संभालते संभालते भी क्यों इंसानियत तार तार सी हो गई है।

इंसानियत जो कुछ खो सी गई है,कहाँ ढूंढू इसे, क्यूँ थोड़ी रूठी हुई सी है।

आशा करती हूँ कि आज की कविता आपको पसंद आई होगी। मिलती हूँ कल फिर एक नए विषय के साथ। तब तक के लिए आपको छोड़ कर जाती हूँ इन सवालों के साथ। सोचिएगा जरूर।

Podcast Episode Link👇

©®दीपिका

और भी दर्द है इस ज़माने में!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/04/aur-bhi-dard-hai-is-zamane-main/

पॉडकास्ट सुने!https://anchor.fm/deepika-mishra/episodes/DuaayeBlessings-ec1mq3

वीडिओ लिंक

https://youtu.be/j0cbn7qYkUM

और भी दर्द है इस जमाने में।

चलिए आज बात करते है “बातें कुछ अनकही सी” में कुछ उस अनकहे दर्द के बारे में, जिसे कई बार हम समझ पाते है और कई बार जाने अनजाने अनसुना कर देते है अपनी ज़िंदगी की भाग दौड़ में।

भी दर्द है इस ज़माने में

खुदगर्ज़ी की इन्तेहाँ तो देखो, वो दर्द भी दिए जाते है और “बेकसूर” भी कहलाते है,

क्या करे अपना दर्द बयां?

और भी दर्द है इस जमाने में, चलो किसी बंद दरवाजें को ताज़ी हवा के लिए खोल के आते है।

पैबंद तो कई है आज भी उसकी पोशाक पर,

पर नज़रों के वार उसके वजूद को तार तार किए जाते है।

और भी दर्द है इस जमाने में, चलो किसी बंद दरवाजें को ताज़ी हवा के लिए खोल के आते है।

बहुत बड़ी तादाद है अभी भी ऐसे लोगों की, जो कि सिर्फ अपने दर्द को सबसे बड़ा पाते है।

किसी की टूटी चारपाई और किसी की घिसी चप्पलें उनका “हाल ए दर्द” छुपा भी नहीं पाते है।

क्या कहे और क्या नहीं, इतना अंतर भी अपनी मासूमियत में समझ भी नहीं पाते है,

और भी दर्द है इस जमाने में, चलो किसी बंद दरवाजें को ताज़ी हवा के लिए खोल के आते है।

खुद गर्ज़ इतने भी ना बने कि खुदगर्ज़ी खुद शर्म के चोले में छुप जाए।

कोई भूखा, कोई बीमार सिर्फ़ मदद की आस में हाथ फैलाता ही रह जाए।

चलो कुछ कम करने की कोशिश करते है ऊँच नीच के फ़ासलें को और आधी आधी बाँट कर खाते है।

और भी दर्द है इस जमाने में, चलो बंद दरवाजों को ताज़ी हवा के लिए खोल के आते है।

©®दीपिका

पिछली पोस्ट पढें

चलो फिर से शुरू करते है।https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/03/chalo-phir-se-shuru-karte-hai/

बेमक़सद जीना भी कोई जीना है?
https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/01/bemaksad-jina-bhi-koi-jina-hai/

पॉडकास्ट पर सुने

https://anchor.fm/deepika-mishra/episodes/DuaayeBlessings-ec1mq3

बेमक़सद जीना भी कोई जीना है?

बिना मक़सद की ज़िंदगी के बारे में सोच कर देखिए?

क्या महसूस होगा? कैसा महसूस होगा?

चलिए आज बात करते है “बातें कुछ अनकही सी” के दूसरे भाग में, इसी बेमक़सद ज़िन्दगी के बारे में।

जिसके बारे में पता नहीं है, क्या कर रहे है और क्यूँ कर रहे है?

बेमक़सद जीना भी कोई जीना है?

बिना मक़सद की ज़िंदगी जैसे पिंजरे में बंद पंछी की सी, जी तो रहा है पर न कोई उमंग है और ना कोई उत्साह।

ना कोई लक्ष्य, ना लक्ष्य को पूरा करने की चाह।।

लक्ष्य होना बहुत जरूरी है जीने के लिए,

वो ज़मीन तैयार करने के लिए, उन सपनों में रंग भरने के लिए।।

मक़सद ना हो तो बेमानी हो जाता है हर साथ और हर संग।

और खूबसूरत ज़िंदगी भी हो जाती है बदसूरत और बदरंग।।

कैसे सिर्फ एक लक्ष्य ज़िन्दगी जीने का मक़सद बदल देता है।

दिन सिर्फ़ एक दिन नहीं रहता है, साथ में रहता है एक जुनून जो कि रातों को सोने नहीं देता है।

अगर इस दुनिया में आए है तो एक निमित्त सबका तय ही होता है, ऐसा मेरा मानना है।

हो सकता है आप कुछ अलग सोच रखते हो इस बारे में, ये तो सबका अपना सोचने का तरीका है।

क्यूँ गवाँ देना इस मौक़े को यूँ ही सोने, उठने में?

ज्यादा सोचने में और आधे खाली गिलास की चर्चा में?

तय करो कि इस दुनिया से जाते वक़्त कोई ख़्वाहिश अधूरी ना रह जाए।

मन खोया खोया से और दिमाग उलझा उलझा से ना रह जाए।

आशा करती हूँ कि आज की अनकही बातें आपको पसंद आई होगी। मैं मिलती हूँ कल फिर आपसे, तब तक के लिए अपना ध्यान रखिये।

स्वस्थ रहिये, घर पर ही रहिए।

©®दीपिका

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/01/12/lakhsya-jarur-banao/

सुनिये इस कविता को!

https://youtu.be/pXyI8JvVPHU

कल की पोस्ट यहाँ पढ़े।

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/01/ajeeb-dastaan-hai-ye/

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/03/16/blogchatter-a2z-challenge-2020-theme-reveal/

आप मेरी अन्य कविताओं को यहाँ सुन भी सकते है,

https://anchor.fm/deepika-mishra

मिलिये मुझसे मेरी अभिव्यक्ति के माध्यम से

https://www.youtube.com/channel/UCSfQiXta_ihvHbOx16rRFKw

सोशल मीड़िया हैंडल्स!

https://twitter.com/Deepika3911/

https://www.facebook.com/deepspassion024

https://www.instagram.com/deepika079

https://www.pinterest.com/ganpatideepi101/

अज़ीब दास्तां है ये।

नमस्कार!

सादर नमन!

स्वागत करती हूं आप सभी लोगों को।आशा करती हूं कि आप सभी लोग ठीक और स्वस्थ होंगे।

हम सभी लोग अवगत है वर्तमान की परिस्थितियों से, बस इतना ही कहना चाहूँगी कि हम लोगों ने, हमारे भारत वर्ष ने पहले भी बहुत सी कठिनाईयों का सामना बड़ी ही बहादुरी और धैर्य के साथ किया है, ये समय भी निकल जाएगा बस ऐसे ही धैर्य और हिम्मत बनाए रखें और निर्देशों का पूरी सावधानी से पालन करें।

एक बार इस पटल से उन सभी लोगों का धन्यवाद और आभार व्यक्त करना चाहूँगी जो दिन रात बिना रुके हुए लगे हुए है इस आपदा की घड़ी में।

तो चलिए शुरू करती हूं आज का “बातें कुछ अनकही सी” का सफ़र।

अज़ीब दास्तां है ये!

अज़ीब दास्तां है ये, कई सवाल पीछे छोड़ जाती है।

कहाँ खड़े है हम और ये राह किधर को जाती है?

क्यूँ भूल गए है हम सरल इंसानी पैमानों को भी?

क्या बस अब यही काम रह गया है कि निकाले कमियाँ और दोष हर दूसरे व्यक्ति की?

हमारी भी कुछ जिम्मेदारियाँ है, हमारे भी कुछ दायरे है,

सवाल पूछना ही सिर्फ़ काम नहीं है हमारा, हाथ बँटाना भी हमारी ही तहज़ीब के अंतर्गत आता है

सोचो, सोचो क्यूँ खिसकती जा रही है ज़मीन अपने ही पैरों के नीचे से?

जो खेल रहे है हम प्रकृति से, अब वक़्त है सावधान होने का क्योंकि वो भी जोड़ रही है हिसाब बड़ी ही तबियत से।

ये प्रकृति है, अपना संतुलन खुद बना ही लेती है,

अब ये हम पर है कितना संभलते है हम, अन्यथा इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है

आशा करती हूँ इस कविता के सार को आप समझ ही गए होगें तो आईए मिलकर कोशिश करे कि हम अपनी जिम्मेदारी को समझ कर उसे पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/03/16/blogchatter-a2z-challenge-2020-theme-reveal/

आप मेरी अन्य कविताओं को यहाँ सुन भी सकते है,

https://anchor.fm/deepika-mishra

मिलिये मुझसे मेरी अभिव्यक्ति के माध्यम से

https://www.youtube.com/channel/UCSfQiXta_ihvHbOx16rRFKw

सोशल मीड़िया हैंडल्स!

https://twitter.com/Deepika3911/

https://www.facebook.com/deepspassion024

https://www.instagram.com/deepika079

https://www.pinterest.com/ganpatideepi101/

आभार और धन्यवाद,

दीपिका

ज़िंदगी का मोल

मुद्दतें बीत जाती है ये सोचने में कि ज़िंदगी तेरा मोल क्या है?

यूँ ही बेवज़ह खो देते है हम वो अनमोल पल जिसमें सारा संसार बसा है।

क्यूँ है हम पाबंदियों के मोहताज़ तेरे अक़्स से रुबरु होने के लिए?

ये तो सबसे अच्छा मौका है, खुद को साबित करने का कि कैसे जिया जाता है इंसानियत के लिए।

हमारी एक छोटी सी सावधानी, लाखों ज़िन्दगियों को सुरक्षित कर सकती है।

घर पर रहिए, सजग रहिए और जागरूक रहिए,अभी यही सबसे बड़ी राष्ट्र सेवा हो सकती है।

नोट– इस समय सबको अभी ज़िम्मेदारी और भागीदारी को समझना चाहिए।

©®दीपिका

मैं आशा!

हँसती और मुस्कुराती, मैं आशा हूँ।

निराशा को दूर भगाती और सबकी हिम्मत बढ़ाती, मैं आशा हूँ।

खड़ी हूँ यही चौखट पर तुम्हारी,

बस बंद दरवाज़े खोलने की देर है।

सोच रहे हो क्या तुम, किस उधेड़बुन में हो?

दोस्त तो बनो मेरे एक बार, किस आशंका में हो?

गर एक बार थामा मेरा दामन,

तो मैं जीवन भर साथ नहीं छोडूँगी।

चलूंगी संग संग तेरे, सपनों को उड़ान दूँगी।

गर गिर रहा होगा तो संभाल लूंगी।

और फिर से उठने का हौंसला दूँगी।

हँसती और मुस्कुराती, मैं आशा हूँ।

निराशा को दूर भगाती और सबकी हिम्मत बढ़ाती, मैं आशा हूँ।

©®दीपिका