काफ़ी हूँ मैं!!

लोग उठाते है सवाल मेरी शख्सियत पर,
मेरे होने पर और कुछ खोने पर।

मेरे कुछ करने पर या थम कर सुस्ताने पर,
आगे बढ़ने पर और पीछे मुड़ के ना देखने पर।

मेरे हँसने पर या घंटों रोने पर, मेरे फैसलों पर और मेरी कबिलियत पर।

मेरे सपनों पर या हकीक़त से रुबरु होने पर, मेरी मंशाओं पर और होने वाली शंकाओं पर।

पर वो भूल जाते है कि मैं आज की नारी हूँ,
खुद ही खुद के लिए काफी हूँ।

हाँ, फर्क़ नहीं पड़ता मुझे अब जमाने की बेड़ियों से,
खुले आसमां में पंख फैलाकर उड़ना सीख चुकी हूं मैं।

खुद का और अपने जैसे अनगिनत का हौंसला बढ़ाती हूँ मैं।
मुश्किलों से घबराती नहीं हूँ मैं, खुद ही खुद के लिए काफी हूँ मैं।

खुद ही खुद के लिए काफी हूँ मैं

©®दीपिका

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं वो हूँ, जिसमें सृजन और विध्वंस की शक्ति है।

मैं वो हूँ, जो करती अपने परिवार की भक्ति है।

मैं वो हूँ, जिसे समझा जाता है कि वो कभी नहीं थकती है।

मैं वो हूँ, जो पैदा होने से मरने तक बिना रुके सबका पोषण करती है

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं वो हूँ जो अस्तित्व पर चोट लगने पर भी अपने पथ से नहीं डिगती है।

लगी रहती है खामोशी से सबके कामों में, वो चुप रहती है पर डरती बिल्कुल नहीं है।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

क्या समझा मैंने, क्या है नारी? क्या हूँ मैं?

मैं ये इसलिए नहीं बोल रही हूं कि मैं खुद एक नारी हूँ।मैंने समझा है जाना है इसे बड़े क़रीब से, ये एक विचित्र सी कलाकारी है।

ये एक नारी है।

ये एक नारी है।

मैंने देखा है उसे कई बार घुटते हुए,

और आँखें भीगी होने पर भी मुस्कुराते हुए देखा है।

वो तब तक उठाती नहीं है सवाल, किसी के क़िरदार पर,

जब तक उसे समझ नहीं आता है कि अब खतरा है उसके खुद के अस्तित्व पर।

पर सवाल उठाते ही क्यूँ उसकी परिभाषा बदल दी जाती है?

कुल की नाज़ से सबसे अनचाहा टुकड़ा कैसे वो बन जाती है?

ये एक नारी है।

ये एक नारी है।

क्यूँ नहीं सुनना और समझना चाहते लोग उसके भी पक्ष को।

वो भी उन्हीं पैमानों को जीती है जिस पर सही ठहराते है वो स्वयं को।

सीता भी वही है, काली भी है वो, कौनसे रूप में देखना चाहते हो आप उसको।

ये काफी हद तक निर्भर करता है आपकी अपनी समझ को।

प्यार पाकर दिल खोल के रख देती है वो अपना।

इतना भी आसां नहीं होता उसके लिए एक पराए घर को अपना बना लेना।

पर वो ये सब इसलिए कर लेती है क्यूँकि वो खुद को समझती है कि वो दो घरों का हिस्सा है।

पर दिल टूट जाता है उसका, जब उसे महसूस होता है कि वो तो बस एक अनकहा और अनछुआ सा क़िस्सा है।

ये एक नारी है।

ये एक नारी है।

दूसरों के नाम के साथ अपना नाम जोड़कर खुश हो जाती है।

ये तो वो संगम है जहाँ दरिया आकर मिल जाती है।

ये तो गागर है अथाह प्रेम की, बूँद बूँद से सागर भर जाती है।

देती है सर्वस्व अपना, अपनों की झोली खुशियों से भर जाती है।

ये एक नारी है। ये एक नारी है।

डरती नहीं है, झुकती नहीं है, खुद को ही चुनौती देती है हर दिन।

मकान घर नहीं बनता, बस होती है चार दीवारें इसके बिन।

जो समझते है इसकी अहमियत को, सिर आँखों पर बिठाकर रखते है।

बहुत कुछ बदल रहा है पर कुछ और भी बदलता देखने की इच्छा रखते है।

मैं करती हूँ सलाम उन लोगों को, जो मेरा साया बन मेरे साथ खड़े रहते है।

मेरी गलतियों को नज़रअंदाज़ कर भी मेरे हुनर को बढ़ावा दिया करते है।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/08/30/aurat-teri-kahani/


“This post is a part of ‘The Woman That I Am’ Blog Hop #TheWomanThatIAm organized byRashi Roy and Manas Mukul #RRxMM. The Event is sponsored by Kraffitti

बंद करो,अब बहुत हो गया।

क्यूँ ये हाहाकार है? क्यूँ चारों तरफ़ मचा चीत्कार है?
क्यूँ अपनी आबरू खोने के बाद भी वो करती इंसाफ़ का इंतज़ार है?

क्यूँ डर है आँखों में उसकी? क्यूँ डरा हुआ और सदमे में उसका परिवार है?
क्या गलती थी उसकी, जो वो चिता पर और खुली हवा में घूम रहे उसके गुनहगार है?

बंद करो, अब बहुत हो गया।
बंद करो, अब बहुत हो गया।

ना समझो उसे भोग की वस्तु,
वो तो किसी की लाड़ली बेटी, बहू, पत्नी और परिवार के जीने का आधार है।

क्यूँ ये हाहाकार है?
क्यूँ चारों तरफ़ मचा चीत्कार है?

ये कैसी विडंबना है? ये कैसा सामाजिक सरोकार है? एक तरफ पूजी जाती है जो कन्या देवी के रूप में नौ दिन, क्यूँ बनती वही उन वैश्यी दरिंदों का शिकार है?

कहाँ जा रहे है हम? क्या ये ही हमारे संस्कार है?

कोई घर से निकलने में डर रही है, तो कोई घर में ही डर के साए में जीने को लाचार है।

क्यूँ ये हाहाकार है?
क्यूँ चारों तरफ़ मचा चीत्कार है?

हर घाव शरीर का, उसकी आत्मा को झलनी कर जाता है।

जीना चाहती हूँ मैं, कहकर दिल का हर दर्द उसकी आँखों में उतर आता है।

बंद करो, अब बहुत हो गया।
बंद करो, अब बहुत हो गया।

ना समझो उसे भोग की वस्तु,
वो तो किसी की लाड़ली बेटी, बहू, पत्नी और परिवार के जीने का आधार है।

कैसे विकृत मानसिकता को बढ़ावा दिया जाता है?

जो जघन्य, क्रूर और बर्बर अपराधी है, कैसे उसकी दया याचिका पर विचार किया जाता है?

जुल्म करते वक़्त जो अपराधी अपनी उम्र का होश खो बैठता है,

बाद में, गलती हो गयी कहकर अपनी उम्र का हवाला देकर सज़ा को कम करने के हजारों रास्तों के द्वार खुलवाता है।

क्या हो गया है हमें, कहाँ जा रहे है हम?

सिर्फ मोमबत्ती लेकर रास्तों पर बैठना समस्या का हल नहीं है, किसी भुलावे में जी रहे है हम।

सोच बदलने की जरुरत है वो लड़कियाँ है, भोग की वस्तु नहीं।

जला कर राख कर देंगी जो अगली बार उठी ऊँगली कोई भी।

बंद करो, अब बहुत हो गया।
बंद करो, अब बहुत हो गया।

ना समझो उसे भोग की वस्तु,
वो तो किसी की लाड़ली बेटी, बहू, पत्नी और परिवार के जीने का आधार है।

©®दीपिका