बीमारी में फर्क कैसा?

उषा किचन साफ़ करके जैसे ही बिस्तर पर आई तो महसूस किया कि उसका पूरा बदन तेज़ बुखार से तप रहा था, कमज़ोरी भी महसूस हो रही थी।

उसने दवाई ली और सोने की कोशिश करने लगी पर दर्द की वजह से ठीक से सो नहीं पा रही थी, पूरी रात इधर से उधर करवट बदलती रही। आँख लगी ही थी कि हॉल से आवाज़ आई, आज चाय नहीं मिलेगी क्या?

उषा को एहसास हुआ कि सुबह हो चुकी थी, पति को अपनी तबियत के बारे में बिन बताए जैसे तैसे उसने नाश्ता बनाया और टिफिन पैक करके पति को ऑफिस और बच्चों को स्कूल भेजा।

अब उषा बिल्कुल भी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पा रही थी वह अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गयी। उषा की सासूमाँ इस बात से मन ही मन परेशान होने लगी थी कि अब आज खाना कौन बनाएगा?

उषा बिस्तर पर लेटे लेटे ये सोचने लगी कि कैसे वह सबके लिए उनकी एक छींक आने पर भी एक टांग पर खड़ी रहती है। दवाई, खाना-पानी सबको टेबल पर रखा मिल जाता है और आज जब वो बीमार है तो उसकी तबीयत ख़राब होने से ज्यादा परेशान लोग इस बात से है कि काम कौन करेगा?

उसकी आँखों से आँसू आ गए कि खाने में नमक कितना पड़ेगा और मसाले का हिसाब क्या है ये तक बताने के लिए अब उसे बार बार बिस्तर से उठना पड़ेगा।

वह सोच में पड़ गयी कि कीमत क्या है उसकी इस घर में? एक काम करने वाली बाई को भी महीने में पाँच छह छुट्टी मिल ही जाती है, वो भी अपनी शर्तों पर ही काम करती है घर में। कोई ज्यादा ना नुकर करता है तो फट से बोल देती है “हिसाब कर दो मेरा”।

पर एक बहु का क्या इतना भी हक़ नहीं है कि बीमार पड़ने पर वो अपनी मर्ज़ी से आराम तक कर सके? अगर उसका मन न करे काम करने का तो खुलकर अपनी तकलीफ अपने परिवार वालों के सामने रख सके।

उसे डर ना हो इस बात का कि उसे इस बात के लिए भी ताना सुनाया जायेगा कि “आजकल की बहुएँ तो छुइमुई सी हो गयी है, हवा लगते ही बीमार पड़ जाती हैं।”

ये सब सोचते सोचते ना जाने कब उसे झपकी लग गयी, उसकी नींद फिर एक आवाज़ से टूटी। “बहु बच्चे आने वाले है, खाना नहीं बनेगा क्या आज?”

उषा धीरे से उठते हुए और अपने कपड़ों को सही करते हुए किचन की तरफ कदम बढ़ा देती है।