चमक उसके स्वाभिमान की…

कौन कहता है कि ये सच नहीं, वो करती सब है, पर सबको जँचती नहीं।

सारा माहौल संभालती है पर अपने अंदर का माहौल बिगड़ने के भय से कभी बचती नहीं।

वो लड़ती रहती है रोज़ अपने अंदर की कशमकश से,

अपने बारे में सोचे या करे समझौता हर छोटे बड़े किस्से से।

आसां नहीं होता अपने आप को उन चीज़ों के लिए मना लेना,

स्वच्छंद उड़ने वाले पंछी को एक छोटे से पिंजरे में कैद कर देना।

अपनी परवाज़ को वो एक ऊँचाई देना चाहती है,

पर अपने स्वाभिमान के साथ समझौता उसे कतई पसंद नहीं है।

इसी तरह चलते चलते वो काफ़ी सफ़र तय कर लेती है,

आते जाते दो राहों पर भी वो मंज़िल नहीं वो खोती है।

उसके भीतर की टोह लेना इतना भी आसान नहीं होता,

वो सिर्फ़ एक औरत नहीं, एक पूरा संसार उसके आँचल में है बसता।

~~दीपिकामिश्रा

तंज़

दूसरों के लिए छोटा पर उसके लिए उसका आत्मसम्मान तब शायद सबसे बड़ा हो जाता है।

अपने ज़मीर की आवाज़ सुनना अब उसके लिए बेहद जरुरी हो जाता है।

हर दूसरे पल सवाल उठाया जाता है जब उसके अस्तित्व पर,
मौन रहकर भी बिना कुछ बोले ही सिर्फ भंगिमाओं से उसे दोषी ठहराया जाता है।

खो देती है वो अपनी पहचान अपनी नज़रों में ही, जब उसे उसका ही अक्श दूसरों के चश्मों से दिखाया जाता है।

पड़ जाती है सोच में कि किया क्या है ऐसा उसने? जो हर बार हर गलती का ज़िम्मेदार उसे ही ठहराया जाता है।

©®दीपिका

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