माँ का प्यार

माँ के चरणों में संसार और आँचल में ढ़ेर सारा प्यार होता है।
चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, माँ का प्यार अपने बच्चे के लिए कभी भी कम नहीं होता है।

माँ के हाथ के बने खाने का दुनिया में कोई मोल नहीं है।
कैसे तोल सकता है कोई तेरे प्यार को, ए माँ! ये कोई बिकाऊ थोड़े ही है।

बस अपना प्यार और आशीर्वाद सदा यूँ ही बनाए रखना, माँ!
तुम जुग जुग जिओ हज़ारों साल, ये ही है तेरे बच्चे की दुआ, माँ।

कितने दुःख दर्द वो अपने बच्चे के लिए हँसते हँसते पी जाती है।

दुःख तो तब होता है जब उसके निःस्वार्थ प्रेम को स्वार्थ की परिभाषा दी जाती है।

शायद समझा नहीं सकती है वो अपनी भावना को शब्दों में।

बच्चा बस खुश रहे, तरक्की करे, ये ही दुआ होती हआई उसकी प्रार्थनाओं में।।

माँ के चरणों में संसार और आँचल में ढ़ेर सारा प्यार होता है।

चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, माँ का प्यार अपने बच्चे के लिए कभी भी कम नहीं होता है।

©®दीपिका

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/08/23/maa-ek-pharishta/

खुद का मोल।

दौलत कमाना आसान है, दुआएं नहीं।

हम भर ले उड़ान कितनी ऊँची ही, पर रहना तो है इसी धरातल पर यही कहीं।।

पैसों का मोल देकर शायद इंसानियत अब भी खरीदी नहीं जा सकती।

सब कुछ खत्म हो जाएँ तो भी अंदर की रूहानियत इतनी आसानी से कहीं नहीं जाती।।

वो वही रहती है उसके अंदर, उसकी अंतरात्मा उसे कचोटती है।

क्यूं पड़ जाते है मोह माया के चुनाव में?

और वो रूह की अच्छाई कहीं दफ़न हो जाती है।

पर कोई नहीं, अच्छाई मरी नहीं है पूरी तरह से अभी भी लोगों में।

औरों के घर का दिया बुझाकर, खुद का चमन रोशन करने की कला हमें अभी भी नहीं आती है।

दौलत कमाना आसान है, दुआएं नहीं।

हम भर ले उड़ान कितनी ऊँची ही, पर रहना तो है इसी धरातल पर यही कहीं।।

©®दीपिका

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/11/04/khud-ki-suno/

लक्ष्य जरूर बनाओ।

लक्ष्य जरूर बनाओ, दुनिया को बताओ या ना बताओ।
छोटे छोटे ही सही पर एक एक कदम आगे बढ़ाओ।।

ये कर्मक्षेत्र है तुम्हारा, तो जाहिर है कि अधिकार क्षेत्र भी, तुम्हारा ही होगा।
हर सही गलत में संभल कर कंकड़ों से खालिश हीरा अब चुनना ही होगा।।

हार मान जाना, हल नहीं है किसी भी मुश्किल का।
आँसू पोंछ कर, अब नई ऊर्जा से अपनी बाजुओं में बल भरना ही होगा।।

तुम युवा हो, संभावनाओं का असीम भंडार है तुम में।
अपने हर डर से लड़ते हुए अब खुद अपने लिए चुनौती बनना ही होगा।।

©®दीपिका

https://youtu.be/pXyI8JvVPHU

जरूर देखे, क्या है ज़िंदगी?

https://youtu.be/6p8LLp1gyNg

वो पहला कदम

हर वो पहला कदम उठाना मुश्किल होता है।
आशंकाओं भरे दिल को समझाना मुश्किल होता है।।

पता नहीं दूसरे देखते है हमें किस नजरिए से,
उनके हर सवाल का जवाब बन जाना मुश्किल होता है।

ये ज़िन्दगी हमारी है, कुछ फैसले हमारे भी हो सकते है,
खुद के लिए लिया हुआ एक फैसला उनके लिए पचाना मुश्किल होता है।

जब तक चले दूसरों के दिखाए रास्ते पर, तब तक तो ठीक।
अपने चुने हुए रास्ते को मंज़िल तक पहुँचाना मुश्किल होता है।

हर वो पहला कदम उठाना मुश्किल होता है।
आशंकाओं भरे दिल को समझाना मुश्किल होता है।।

©®दीपिका

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/11/17/dil-chota-na-kar/

ज़िंदगी को जिताना है।

जब भी सुनती हूँ किसी आकस्मिक निधन के बारे में, जिसका ताल्लुक आत्महत्या से होता है तो मन में ढेरों सवाल कौंध जाते है।

सवाल बदलते परिवेश के बारे में, सवाल जो कि मुझे अन्दर तक झकझोर जाते है।

मन सिहर उठता है उन भावनायों के बारे में सोचकर कि क्यूँ किसी ने ऐसा फैसला लिया होगा?

क्यूँ आइडियल ज़िंदगी की परिभाषा को धता बता कर अपना जीवन खत्म कर लिया होगा।

शायद उसे विश्वास हो चलता है कि उसके रहने ना रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

या खुद को वो और घुटता हुआ नहीं देख सकता।

एक कमज़ोर पल उससे क्या से क्या करवा जाता है?

अगर थोड़ी सी हिम्मत दिखाता इस मुश्किल घड़ी में तो शायद खुद को अपनों के बीच में खड़ा पाता।

हम कोई नहीं है किसी की निजी ज़िंदगी में झांकने वाले।

पर अगर बाँट कर दुख कम हो सकता है तो क्यूँ नहीं,हम भी नहीं पीछे हटने वाले।

सवाल उठता है।

क्यूँ हार जाती है ज़िंदगी, मौत की बाहों में?
सब कुछ पाकर भी क्यूँ खो जाती है अंजानी राहों में?

शायद बात कर पाना उसके लिए बहुत मुश्किल होता होगा।
सूझती होगी ना कोई सूरत ना सीरत, हर जख्म दर्द देता होगा।

इंसानी रिश्तों से बढ़कर कुछ नहीं होता।
गर बाँटा होता दर्द उसका भी तो शायद आज वो भी ज़िन्दा होता।

क्यूँ भूल जाते है, बंद किवाड़ों के पीछे भी एक कहानी होती है।
अगर आती सुकून भरी हवा खिड़कियों से तो शायद कुछ और रवानी होती।

बस यही गुजारिश

“हो सके तो हर एक जिंदगी के लिए जीने की कोशिश करे।

हारे खुद को ना, उस गलत सोच को ही हरा दे।”

©®दीपिका

यहाँ देखिये

“रुक जाना नहीं तू कभी हार के”

https://youtu.be/1xWrKHE7dAA

बंद करो,अब बहुत हो गया।

क्यूँ ये हाहाकार है? क्यूँ चारों तरफ़ मचा चीत्कार है?
क्यूँ अपनी आबरू खोने के बाद भी वो करती इंसाफ़ का इंतज़ार है?

क्यूँ डर है आँखों में उसकी? क्यूँ डरा हुआ और सदमे में उसका परिवार है?
क्या गलती थी उसकी, जो वो चिता पर और खुली हवा में घूम रहे उसके गुनहगार है?

बंद करो, अब बहुत हो गया।
बंद करो, अब बहुत हो गया।

ना समझो उसे भोग की वस्तु,
वो तो किसी की लाड़ली बेटी, बहू, पत्नी और परिवार के जीने का आधार है।

क्यूँ ये हाहाकार है?
क्यूँ चारों तरफ़ मचा चीत्कार है?

ये कैसी विडंबना है? ये कैसा सामाजिक सरोकार है? एक तरफ पूजी जाती है जो कन्या देवी के रूप में नौ दिन, क्यूँ बनती वही उन वैश्यी दरिंदों का शिकार है?

कहाँ जा रहे है हम? क्या ये ही हमारे संस्कार है?

कोई घर से निकलने में डर रही है, तो कोई घर में ही डर के साए में जीने को लाचार है।

क्यूँ ये हाहाकार है?
क्यूँ चारों तरफ़ मचा चीत्कार है?

हर घाव शरीर का, उसकी आत्मा को झलनी कर जाता है।

जीना चाहती हूँ मैं, कहकर दिल का हर दर्द उसकी आँखों में उतर आता है।

बंद करो, अब बहुत हो गया।
बंद करो, अब बहुत हो गया।

ना समझो उसे भोग की वस्तु,
वो तो किसी की लाड़ली बेटी, बहू, पत्नी और परिवार के जीने का आधार है।

कैसे विकृत मानसिकता को बढ़ावा दिया जाता है?

जो जघन्य, क्रूर और बर्बर अपराधी है, कैसे उसकी दया याचिका पर विचार किया जाता है?

जुल्म करते वक़्त जो अपराधी अपनी उम्र का होश खो बैठता है,

बाद में, गलती हो गयी कहकर अपनी उम्र का हवाला देकर सज़ा को कम करने के हजारों रास्तों के द्वार खुलवाता है।

क्या हो गया है हमें, कहाँ जा रहे है हम?

सिर्फ मोमबत्ती लेकर रास्तों पर बैठना समस्या का हल नहीं है, किसी भुलावे में जी रहे है हम।

सोच बदलने की जरुरत है वो लड़कियाँ है, भोग की वस्तु नहीं।

जला कर राख कर देंगी जो अगली बार उठी ऊँगली कोई भी।

बंद करो, अब बहुत हो गया।
बंद करो, अब बहुत हो गया।

ना समझो उसे भोग की वस्तु,
वो तो किसी की लाड़ली बेटी, बहू, पत्नी और परिवार के जीने का आधार है।

©®दीपिका

तमन्ना ए दिल!

रोज़ की मसरूफ़ियत को नज़रअंदाज़ करना चाहता है, ये दिल।
कुछ पल फुर्सत के निकाल कर खुद को खुद से मिलवाना चाहता है, ये दिल।

मस्त परिंदे की तरह आसमां में उड़ने की तमन्ना रखता है, ये दिल।
हजारों ख्वाहिशों को बंद पलकों के तले ज़िन्दा रखता है, ये दिल।

कहीं बार व्यर्थ आशंकाओं से भी भर जाता है, ये दिल।
क्यूँ, कब, कैसे के भंवर में भी फँस जाता है, ये दिल।

सब कुछ पाने की चाहत में कहीं खुद को हार न दूँ, इस डर से भी रूबरू करवाता है ,ये दिल।
पर कैसे सपनों को मंजिल से मिलवाया जाता है, इसका रास्ता दिखाता है, ये दिल।

रोज़ की मसरूफ़ियत को नज़रअंदाज़ करना चाहता है, ये दिल।
कुछ पल फुर्सत के निकाल कर खुद को खुद से मिलवाना चाहता है, ये दिल।

©®दीपिका

संडे की तलाश

एक अदद “संडे” के इंतज़ार में निकल जाता है पूरा “हफ़्ता”।
और “अलसाई आँखें” खुश होने लगती है कि अब”नींद”पूरी होने वाली है।

पर क्या पता उस “पगली” को कि पूरे हफ़्ते की कसर तो “संडे” को ही निकलने वाली है।

बचे हुए “कामों की लिस्ट” और “ढेरों फरमाइशें” अब उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रही है।

पर वो भी “चंद सुकून” के पलों की चाहत में अपना “सीक्रेट प्लान” तैयार कर रही है।

पर कहाँ गया मम्मी का संडे?

वो खुद को समझाकर फिर से बचे हुए कामों को समेटने में “व्यस्त” हो जाती है।
और अपने “सीक्रेट प्लान” को भूलाकर फिर से अगले संडे का “इंतज़ार” करने लग जाती है।

©® दीपिका

देखना न भूलें

https://youtu.be/RU-aBEqPD_w

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Regards & Gratitude,

Deepika

क्यूँ कथनी और करनी में इतना अंतर है?

क्यूँ कथनी और करनी में इतना अंतर है?
भीतर के भाव और वाणी में छुपा ऱाज भयंकर है।

अच्छा सबको लगता है दो मीठे बोल प्यार के सुनना,
पर क्यूँ कल्पना के सागर और जीती वास्तविकता में इतना अंतर है?

जताया जाता है कि हम साथ खड़े है हर पल तुम्हारे,
तुम व्यर्थ डटे हो, हम ही तो दे रहे है बाजुओं को सहारे।

हर वक़्त बड़े होने का भाव दिखाया जाता है,
पर शायद बड़ा बनने के लिए भी बड़प्पन को पहले अंदर पनपाया जाता है।

क्यूँ ये समझना और समझाना इतना मुश्किल है?
क्यूँ कथनी और करनी में इतना अंतर है?भीतर के भाव और वाणी में छुपा राज़ भयंकर है।

©® दीपिका