तंज़

दूसरों के लिए छोटा पर उसके लिए उसका आत्मसम्मान तब शायद सबसे बड़ा हो जाता है।

अपने ज़मीर की आवाज़ सुनना अब उसके लिए बेहद जरुरी हो जाता है।

हर दूसरे पल सवाल उठाया जाता है जब उसके अस्तित्व पर,
मौन रहकर भी बिना कुछ बोले ही सिर्फ भंगिमाओं से उसे दोषी ठहराया जाता है।

खो देती है वो अपनी पहचान अपनी नज़रों में ही, जब उसे उसका ही अक्श दूसरों के चश्मों से दिखाया जाता है।

पड़ जाती है सोच में कि किया क्या है ऐसा उसने? जो हर बार हर गलती का ज़िम्मेदार उसे ही ठहराया जाता है।

©®दीपिका

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https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/10/10/ulahana/

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उलाहना

दूसरों पर ऊँगली उठा देना बहुत आसान होता है।
खुद को मासूम और उसको गुनहगार बता देना बहुत आसान होता है।

कभी फुर्सत हो तो बैठो और सुनो हाल ए दिल उसका भी,
शायद समझ पाओ कि हर सच को झूठ बता देना बहुत आसान होता है।

अंदाज़ा तभी लगाया जा सकता है मजबूरियों का उनकी,
गर खुद गुज़रे हो उस दोराहे से कभी।

ऐसे तो हर कोशिश पर उनकी सवाल उठा देना बहुत आसान होता है।
खुद के किये हुए को सही और दूसरों के व्यक्तित्व पर पैबंद लगा देना बहुत आसान होता है।

~©®दीपिका

जिंदगी सबसे बड़ी गुरु है।

जिंदगी सबसे बड़ी गुरु है, जीना सिखा देती है।
आँखों से गिरे हर आँसू को पीना सिखा देती है।

जो जाते है गर तारें अगर मायूसियों की गर्दिशों में,
उन्हें रोशनी का नया सूरज दिखा देती है।

आते है बहुत से दो राहें मंजिलों की चाह में,
पर है शुक्रिया तेरा, ए जिंदगी! तू हर बार गिरकर उठना सिखा देती है।

ग़मों की गहराइयों और सुखों की परछाईयों में,
अपनों और परायों की पहचान सिखा देती है।

जिंदगी सबसे बड़ी गुरु है जीना सिखा देती है।
मुश्किलों भरी ज़मीन पर ख्वाइशों के फूल खिला देती है।

©®दीपिका

Now you can also listen to the poem. Here is the link.

https://youtu.be/NXZjA055AEU

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जिंदगी का सफ़र”

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/06/06/zindagi-ka-safar/

मन की शांति

जीती थी जो औरों की मन की शान्ति के लिए,
गैरों की हँसी और अपनों की खुशी के लिए।

आज देखकर उसे एक नया अनुभव हुआ,
छोड़ते हुए जिसने कड़वे लम्हों को पीछे, खुद के लिए जीने का निश्चय किया।

कट तो रही थी ज़िंदगी यूँ भी शनै: शनै:।
पर सलीके से ज़िंदगी जीने के लिए कुछ नए पैमानों को गढ़ा गया।
कुछ छोड़ा तो कुछ नया रचा गया।

बदल रही है अब उसकी भी सोच बदलती हवाओं के साथ,
खो नहीं सकती अब शांति वो भी अपने मन की, हर बदलती जरुरतों के साथ।

एक नया आशियाँ अब उसने भी बनाया है।उस अँधेरी रात के बाद फिर नया सवेरा आया है।

ज़िंदगी जीने के तरीके अब उसके भी बदल गए है।कुछ और ना सही पर उसके हौंसलों को पंख मिल गए है।

अब मुश्किल है शायद पीछे मुड़ना, मंजिलों की राहों को छोड़ कर,

यूँ ही चलते चलते अब इन राहों पर ज़िंदगी जीने के नए बहाने मिल गए है।

You can read another Hindi poem here.

Aurat Teri Kahani”

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/08/30/aurat-teri-kahani/

Regards & Gratitude,

Deepika

औरत: तेरी कहानी

दिल भर सा आता है अगर नज़र डालती हूँ औरतों की जिंदगानी पर।

क्या खूब क़िस्मत बनाई है रब ने उनकी, अक्सर कसी जाती है दूसरों की बनाई कसौटियों पर।

सबको खुश करने के चक्कर में उसकी अरमानों की पोटली कहीं पीछे छूट जाती है।

अलग अलग वज़हों से ही सही, न जाने कितनी बेड़ियों में बाँधी जाती है।

आज भी हम उठ नहीं पाए है, ओह! आपके घर बेटी हुई है,की मानसिकता से।

लड़कों के लिए अलग और लड़कियों के लिए बनाई गयी अलग परिभाषाओं से।

क्यूँ इस पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का वो दर्ज़ा नहीं है?

क्यूँ वो दो दो घर होने के बावजूद किसी एक का भी अभिन्न हिस्सा नहीं है?

क्यूँ उसे परिभाषित किया जाता है अलग अलग उपमाओं में?

क्यूँ वजूद तलाशना पड़ता है अपना उसे अतीत की परछाइयों में?

जहाँ जन्म लिया, ये तो पराया धन है, कहकर विदा कर दिया जाता है।

और दूसरी ओर, ये तो दूसरे घर से आई है, कहकर सच में पराया कर दिया जाता है।

पूरी ज़िंदगी लगाने के बाद भी क्यूँ एक जगह उसकी अपनी नहीं बन पाती है?

कभी पिता तो कभी पति के नाम के साथ जुड़कर रहना ही उसकी तकदीर बन जाती है।

उसे और कुछ नहीं बस सम्मान और अपनापन चाहिए।

कोई न लगाए प्रश्न चिन्ह उसके व्यक्तित्व पर, उसे ये भरोसा चाहिए।

आशा करती है वो कि एक औरत की आवाज दूसरी औरत के द्वारा उठाई जाएगी।

जो उसने झेला है कभी, समय आने पर दूसरी औरत को झेलने से बचाएगी।