Maybe she is good for nothing for others…

Maybe she is good for nothing for others…

But how can she ignore it???

Damn!! It is her self respect.No matter what others think.

Now it is high time…she must listen to her inner voice,

Others must understand that she too can have her own choice.

Why do they question her personality and integrity?

Are they even worthy enough to blot her dignity?

When they harass her with an abusive tone and rough voice,

How then does she accept this, after all, isn’t it a matter of her pride!

Gradually she also starts accepting what others think about her.

She doesn’t even feel like facing her favourite mirror.

She doesn’t understand what is going wrong with her.

How can she be the reason for every problem?

It is high time, she understands that she too own a unique place in between those thousand personalities,

She can also think about her future and life, despite fulfilling her duties.

Maybe she is good for nothing for others….

~~Deepika Mishra

You tube Poetry link👇

https://youtu.be/CMELPt4vzGM

Podcast Link👇

https://anchor.fm/deepika-mishra/episodes/Episode-15-Abhi-Thami-Nahi-hai-Zindagi-ekctqq

Instagram Link👇 https://www.instagram.com/deepika079

Deepika Mishra

Motivational Blogger & Writer

नई खुशियों के द्वार

नई खुशियों के द्वार…

जब खुद को समझाना मुश्किल लगने लगे, जब हर अपना बेगाना लगने लगे,

जब हर बात दिल को दुःखाने लगे, जब आंखें भी सबसे नज़रें चुराने लगे।

तो समझ लेना कि मन घावों से भर गया है, ना चाहते हुए भी मन में कुछ गढ़ सा गया है।

ये समय है खुद को नकारात्मक विचारों से दूर करने का,जो घट चुका है उसे भुलाकर आगे बढ़ने का।

क्योंकि जब तक हम उन्हीं बातों में उलझे रहेंगे,अपने उत्साह को पल पल खोते रहेंगे।

जरूरी नहीं कि एक बार जो गलत हुआ है, वो बार बार ही अपने आप को दोहराएगा,जो हो रहा है उसमें छिपा हो सकता है कोई मक़सद जिसका आभास आपको भविष्य ही करवाएंगा।

अपनी खुशियों की चाबी अपने हाथ में ही रखिये,दूसरों को मत दीजिये, ये समझना भी अब जरूरी हो जाता है,

कब तक भटकते रहोगे आप गम के अंधेरों में, खुद को एक मौका देना भी नई खुशियों के द्वार खोल जाता है।।

©®दीपिका मिश्रा

जब मैं थक जाया करती हूँ…

जब मैं थक जाया करती हूँ तो खुद को समझाया करती हूँ कि कोई बात नहीं,

थोड़ा सुस्ता ले…

थम जा थोड़ा और अब तक के जिए पलों के थोड़ा हिसाब लगा ले।

कोई हर्ज़ नहीं है थोड़ा गुणा भाग करने में,

क्या खोया, क्या पाया इस जद्दोजहद की जांच करने में।

जब मैं थक जाया करती हूँ तो खुद को समझाया करती हूँ,

सारी जिम्मेदारियों के बोझ तले कुछ पल सुकूँ के अपने लिए चुराया करती हूँ।

जहाँ ना बंदिश होती है ख्यालों पर और ना ही किसी सोच का पहरा होता है,

आज़ादी होती है खुद से मिलने की, उन चंद मिनटों का वक़्त भी कितना सुनहरा होता है।

जहाँ मैं खुद से मिला करती हूँ, खुद से गिला करती हूँ,

रखती हूँ लेखा जोखा अपने सपनों का, अपने अरमानों का,

जो पूरे हुए उनका और जो छूट गए उनके हर्ज़ानों का।

जब मैं थक जाया करती हूँ तो खुद को समझाया करती हूँ कि कोई बात नहीं, थोड़ा सुस्ता ले…

थम जा थोड़ा और अब तक के जिए पलों के थोड़ा हिसाब लगा ले।

अगर लगे कि सब बराबर है तो फिर तो कोई गम ही नहीं,

पर गर लगे कि मामला गड़बड़ है और स्थिति काबू में नहीं है तो रास्ता बदलने में भी देर नहीं लगाती हूँ।

जब मैं थक जाया करती हूँ तो खुद को समझाया करती हूँ।

~~दीपिका मिश्रा

https://youtu.be/CMELPt4vzGM

यहाँ पढ़े

Read more..

बातें कुछ अनकही सी..

Baate kuch ankahi si..

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/07/15/baate-kuch-ankahi-si/

पॉडकास्ट सुने… जिओ दिल से!!

Podcast… Jio Dil Se

https://anchor.fm/deepika-mishra

नई कविता

New poem…

वक़्त जो ठहर से गया है

https://youtu.be/UHUGbFsx_6k
प्लीज लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करे।

If you like the content, Please like, share and subscribe

Regards & Gratitude,

Deepika Mishra

जिंदगी एक इम्तेहान!!

जिंदगी एक इम्तेहान..

जिंदगी हर कदम एक नया इम्तेहान लेती है,कभी फूलों का हार तो कभी काँटों की सेज देती है।ये हम पर है कि क्या हम डर जाते है मुश्किलों का सामना करने से?कभी खुद की कमजोरियों से और कभी औरों की चुनौतियों से।ये भी सच है कि..बार बार किस्मत दरवाजे पर दस्तक दिया नहीं करती है,जो गर तू खुद अपनी कद्र नहीं करती है तो औरों से अपेक्षा भी व्यर्थ ही रखती है।कुछ चीजों को अब समय के साथ सीखना ही होगा..खुद ही अपने मनोबल को ऊँचा करना होगा,और हर छोटी बात को दिल पर लगाकर, व्यर्थ में समय गँवाने की आदत को भूलना होगा।तभी एक आशा से भरी राह खुद के लिए खोज पाएंगे,थोड़ा थोड़ा करके ही सही अपनी सफलता का घड़ा खुद अपने लिए भर पाएंगे।~~दीपिका

उम्मीदों वाली राह!

एक रास्ता बंद हो तो दूसरा खुल सकता है।मुश्किलें कितनी ही गहरी क्यूँ ना हो, हल निकल ही सकता है।

असफलता बंद नहीं कर सकती, द्वार सफलता के,

अगर खोजे जाएं तो निकल आएंगे हज़ारों बहानें जीने के।

आसां लगता है हमें हार मान कर बैठ जाना।

ये तो मुझसे होगा ही नहीं, ये सोच कर जंग लड़ने से पहले हथियार डाल देना।

शायद एक छोटी सी कोशिश एक नई आशा का द्वार खोल सकती है।

जो कल तक लगता था तुझे असंभव, वही आस की मिट्टी एक नई कोंपल अंकुरित कर सकती है।

एक रास्ता बंद हो तो कोशिश करने से दूसरा खुल सकता है।

मुश्किलें कितनी ही गहरी क्यूँ ना हो, हल निकल ही सकता है।

~~©®दीपिका

https://youtu.be/RxJQiVYn8NU

ऐ मन! तू अच्छा करता है।

ऐ मन! तू अच्छा करता है,

जो खुद रोकर अपने आँसू खुद ही पोंछ लेता है।

अच्छा करता है जो किसी भ्रम में नहीं जीता है,

अपने स्वाभिमान को तार तार नहीं होने देता है।

ऐ मन! तू अच्छा करता है।

कोई आएंगा और पोछेंगा आँसू मेरे, इस भुलावे में नहीं जीता है।

खुद गिरता है तो खुद उठने की भी ताकत रखता है।

खुद देता है खुद को संबल, और खुद ही अपनी राह चुनता है।

ऐ मन! तू अच्छा करता है।

दूसरे आएंगे तो मुमक़िन है कि सिर्फ़ तेरी गलतियाँ ही बताएंगे,

घाव पर मरहम लगाने की बात कहकर, जख्मों को ही कुरेद जाएंगे

बची हुई आस और हिम्मत पर भी प्रश्न चिन्ह लगाएंगे।

तेरे दामन में है कितने दाग, ये बार बार तुझको ही गिनवाएंगे।

फिर आएंगे कहकर, बीच राह में ही छोड़ जाएंगे।

तू समझाता रह जाएंगा खुद को और वो अपनी दुनिया में ही मस्त हो जाएंगे।

ऐ मन! तू अच्छा करता है,जो खुद रोकर अपने आँसू खुद ही पोंछ लेता है।

अच्छा करता है जो किसी भ्रम में नहीं जीता है,अपने स्वाभिमान को तार तार नहीं होने देता है।

©®दीपिका

यहाँ पढ़े।

“क़ाफी हूँ मैं”!!

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/05/18/kafi-hu-mai/

यहाँ सुने।

“अभी थमी नहीं ज़िंदगी”!!

https://youtu.be/W9gegLb7TlU

वक़्त का मोल

हर किसी के पास उतना ही वक़्त होता है,

समय का पहिया भी सबके लिए बराबर ही घूमता है,

और यहाँ तक कि सूरज का निकलना और अस्त होना भी सबके लिए एक समान ही होता है।

जब प्रकृति ने ही भेदभाव नहीं किया हमारे साथ, तो हम कैसे कर सकते है?

क्यूँ खुद को कम आँक कर खुद से ही धोखा कर सकते है?

क़ाबिल है सभी, बस अपनी क्षमताएँ पहचानने में देर कर देते है।

जो समझ जाते है अपनी अहमियत, वो फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखते है।

वो फिर कभी पीछे मुड़ के नहीं देखते है।

~~दीपिका

अहमियत


समझाना जितना जरूरी है, उतना समझना भी।बोलना जितना जरूरी है उतना सुनना भी।

बस यूँ ही कल्पनाओं के संसार में जिया नहीं जा सकता है। और बस यूँ ही एकतरफ़ा इन राहों पर चला नहीं जा सकता है।

शिकायतों के काँटों के बीच कुछ मुस्कराते फूल भी होने चाहिए।

किसी में कैसे हो सकती है सिर्फ कमियाँ ही, ये भी तो समझना चाहिए।

गर दे नहीं सकते साथ किसी का तो, बस सुन ही लो उसकी पुकार, यारों!

अँधेरोंमें भटकने के बाद दुबारा रोशनी पाने का उसका भी है अधिकार, यारों!

बोलना जितना जरूरी है उतना सुनना भी।

समझाना जितना जरूरी है उतना समझना भी।

~~दीपिका

कविता सुनने के लिए यहाँ क्लिक करे।

https://youtu.be/FvsmhObVUH8

मज़बूरी!!

वो आएं थे ढेरों आरजूएं लेकर शहर की ओर,

अब जब जा रहे है तो बहुत सी ख़्वाहिशें दफ़न कर जा रहे है।

पता नहीं अब कब वापस आएंगे इन रास्तों पर मुड़ कर,

जिन पर नंगे पाँव चले जा रहे है।।

जिन्हें अपने सपनों को मंज़िल पहुँचाने के लिए चुना था,

अब उन्हीं राहों को पीछे छोड़े जा रहे है।

जो बनाते थे कभी सबके सपनों का घर,

आज वही एक छत और दो जून की रोटी की तलाश में

भटके जा रहे है।।

वो आएं थे ढेरों आरजूएं लेकर शहर की ओर,

अब जब जा रहे है तो बहुत सी ख़्वाहिशें दफ़न कर जा रहे है।।

जो गलियां, जो शहर लगता था कभी अपना सा,

अब वही क्यूँ परायों की गिनती में खड़े नज़र आ रहे है।

सोचा ना था!!

एक दिन ऐसा भी आएंगा जब सड़के सूनी और शहर

वीरान हो जाएंगा।

कोई मज़दूर बेउम्मीद होकर वापस लौट जाएंगा।।

©® दीपिका

इस लिंक पर क्लिक करके कविता सुनें।

https://youtu.be/APJPn4gEY7w

काफ़ी हूँ मैं!!

लोग उठाते है सवाल मेरी शख्सियत पर,
मेरे होने पर और कुछ खोने पर।

मेरे कुछ करने पर या थम कर सुस्ताने पर,
आगे बढ़ने पर और पीछे मुड़ के ना देखने पर।

मेरे हँसने पर या घंटों रोने पर, मेरे फैसलों पर और मेरी कबिलियत पर।

मेरे सपनों पर या हकीक़त से रुबरु होने पर, मेरी मंशाओं पर और होने वाली शंकाओं पर।

पर वो भूल जाते है कि मैं आज की नारी हूँ,
खुद ही खुद के लिए काफी हूँ।

हाँ, फर्क़ नहीं पड़ता मुझे अब जमाने की बेड़ियों से,
खुले आसमां में पंख फैलाकर उड़ना सीख चुकी हूं मैं।

खुद का और अपने जैसे अनगिनत का हौंसला बढ़ाती हूँ मैं।
मुश्किलों से घबराती नहीं हूँ मैं, खुद ही खुद के लिए काफी हूँ मैं।

खुद ही खुद के लिए काफी हूँ मैं

©®दीपिका