तमन्ना ए दिल!

रोज़ की मसरूफ़ियत को नज़रअंदाज़ करना चाहता है, ये दिल।
कुछ पल फुर्सत के निकाल कर खुद को खुद से मिलवाना चाहता है, ये दिल।

मस्त परिंदे की तरह आसमां में उड़ने की तमन्ना रखता है, ये दिल।
हजारों ख्वाहिशों को बंद पलकों के तले ज़िन्दा रखता है, ये दिल।

कहीं बार व्यर्थ आशंकाओं से भी भर जाता है, ये दिल।
क्यूँ, कब, कैसे के भंवर में भी फँस जाता है, ये दिल।

सब कुछ पाने की चाहत में कहीं खुद को हार न दूँ, इस डर से भी रूबरू करवाता है ,ये दिल।
पर कैसे सपनों को मंजिल से मिलवाया जाता है, इसका रास्ता दिखाता है, ये दिल।

रोज़ की मसरूफ़ियत को नज़रअंदाज़ करना चाहता है, ये दिल।
कुछ पल फुर्सत के निकाल कर खुद को खुद से मिलवाना चाहता है, ये दिल।

©®दीपिका