लोग क्या कहेंगे!!

कुछ बातें कौंधती रहती है यदा कदा दिमाग में….

उसमें से एक बात है कि लोग दूसरों के जीवन में इतनी दिलचस्पी क्यों लेते है?

क्या खाया, क्या पहना, क्या लिया, किससे मिले, क्या बात की, वगैरह वगैरह।

“पूरे दिन का कितना समय लोग सिर्फ ये सोचने में लगा देते है कि दूसरे क्या कर रहे है?क्या कह रहे है? क्यों कह रहे है?”

हालांकि इन सब बातों का हम पर फ़र्क तो पड़ना नहीं चाहिए, पर पड़ता है, जबरदस्त पड़ता है। आदत जो पड़ गई है खुद की छवि को दूसरों के आईने से देखने की।

सही कह रही हूँ ना। कितना कम समय लगता है किसी को हमारे आत्मविश्वास की धज़्ज़ियाँ उड़ाने में और गौर करने वाली बात कि हम उन्हें ऐसा करने भी देते है।

“दूसरा हमारे किये गए कामों पर सही या गलत की मोहर लगाएंगा, तभी हम खुद को सही या ग़लत समझेगें। होता है ना ऐसा हमारे साथ?”

“क्या कभी हमने शांति से अकेले में बैठ कर ये सोचा है कि हम क्या चाहते है अपने जीवन से?हमारी क्या रुचियाँ है? क्या करना हमें पसंद है और क्या चीज़ हमें भाती नहीं है?”

सच बताइयेगा..”कितनी ही बार मन में आया होगा कि क्यों गलती करके सीखना गलत माना जाता है?क्यों बने बनाएं रास्ते पर चलने वालों को ही सही ठहराया जाता है?”

कितने ही लोग सिर्फ़ जवाब देने के डर से वो नहीं कर पाते जो वो करना चाहते है अपने लिए, अपनी मर्ज़ी से और फिर बाद में पछताते रह जाते है कि अगर हमने भी अपने लिए वक़्त रहते आवाज़ उठाई ली होती तो आज स्थिति कुछ अलग ही होती।

पर एक बात बताइएं, “जब हम खुद को ही अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए तैयार नहीं कर पा रहे होते है ऐसी स्थिति में दूसरों पर दोष लगाने का भी क्या फायदा?”

मेरा ये मानना है कि हर कोई एक मकसद के साथ इस दुनिया में आता है, कुछ उसे पहचान कर उसको पूरा करने में सफ़ल हो जाते है चाहे कितनी ही मुश्किल क्यों न आएं, पीछे हटने के बारे में सोचते तक नहीं है, चाहे कोई साथ हो या ना हो वही कुछ लोग अपनी हर एक गलती का जिम्मेदार दूसरों को ठहरा कर पतली गली से निकल जाते है।

जब तक हम “क्या कहेंगे लोग” के रोग से बाहर नहीं निकलेगे तब तक कभी अपनी मनचाही मंज़िल तक नहीं पहुँच सकते।

आपका क्या कहना है इस बारे में, जरूर अपने अनुभव मेरे साथ शेयर कीजिएगा। मैं मिलूँगी आपसे एक नए विषय के साथ। तब तक अपना ध्यान रखिए और सोचिए जरूर कि आप किस मकसद से आएं है इस जहन में?

धन्यवाद,
दीपिकामिश्रा