नई सहर रोशनी वाली!

गमों के बादल छंट जाएँगे जब होगी नई सहर रोशनी वाली।

एक एक तिनके से बनेगा फिर से आशियाँ उम्मीदों वाला,

और एक नई डगर की तलाश होगी

हम भी चल देंगे साथ तुम्हारे, कुछ बेहतरी की आस में।

फिर से एक नई दुनिया, नई शुरुवात के लिए तैयार होगी।

अँधेरा कब तक रोकेगा उजाले की परवाज़ को

चिंता कब तक रोकेंगी उसके अगले आगाज़ को।

वो फिर उठेगा एक यौद्धा की तरह कर्मवीर बनकर,

फिर से वही रौनक बाज़ारों में लौटेगी।

गमों के बादल छंट जाएँगे जब होगी नई सहर रोशनी वाली।

एक एक तिनके से बनेगा फिर से आशियाँ उम्मीदों वाला,

और एक नई डगर की तलाश होगी।

बस तू धीरज न खो, हिम्मत न हार,

लगा रह अपनी कोशिशों में।

फिर से तेरी तक़दीर तेरी चौखट पर तेरा इंतज़ार कर रही होगी।

फिर से एक नई सहर नई ऊर्ज़ा के साथ तेरा दीदार कर रही होगी।

गमों के बादल छंट जाएँगे जब होगी नई सहर रोशनी वाली।

एक एक तिनके से बनेगा फिर से आशियाँ उम्मीदों वाला,

और एक नई डगर की तलाश होगी।

©® दीपिका

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वक़्त जो रुकता नहीं।

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प्यार की ताक़त!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/18/pyar-ki-taakat/

माँ की जादूगरी!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/17/maa-ki-jaadugari/

नज़रिये का फेर!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/16/nazariye-ka-pher/

मन की सुंदरता!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/15/man-ki-sundarta/

लम्हे जो बीत गए है।https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/14/lamhe-jo-beet-gaye-hai/

बीते कल की परछाई!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/13/beete-kal-ki-parchaai/

जंग दिल और दिमाग की!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/11/jang-dil-aur-dimag-ki/

हज़ारों बहाने है जीने के!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/09/hazaro-bahane-hai-jeene-ke/

गमों के बादल!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/08/gamo-ke-baadal/

वो एक फ़रिश्ता!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/06/vo-ek-pharista/

इंसानियत कुछ खो सी गई है!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/06/insaaniyat-jo-kuch-kho-si-gayi-hai/

और भी दर्द है इस ज़माने में!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/04/aur-bhi-dard-hai-is-zamane-main/

चलो फिर से शुरू करते है।https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/03/chalo-phir-se-shuru-karte-hai/

बेमक़सद जीना भी कोई जीना है?https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/01/bemaksad-jina-bhi-koi-jina-hai/

अजीब दास्तां है ये!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/01/ajeeb-dastaan-hai-ye/

मन की सुंदरता!

बाहरी काया पर तो सबका ध्यान होता है पर भीतर क्या है,

ये कितने जानना चाहते है?

अगर भाया नहीं रंग रूप फिर भी,

मन की सुदंरता के लिए कितने आगे आते है?

शायद बहुत कम मिलेंगे जिनके लिए मन का सुंदर होना ज्यादा जरूरी होता है, तन के सुंदर होने से।

उन्हें आकर्षण होता है उनकी बातों का, उस आभा का, ना कि फ़र्क पड़ता है क्षणभंगुरी काया से।

बाहरी आकर्षण का क्या है?

आज है ,कल नहीं रहेगा!

भीतरी सुदंरता ही अलौकिक है, शाश्वत है, इसका अस्तित्व तो सदा बना रहेगा।

जिसके मन में मैल न हो उसकी आभा में एक अलग सी चमक दिखाई देती है।

महसूस कर सकते हो उस रूहानी अनुभव को, एक इबादत सी, एक दुआ सी सुनाई देती है।

बाहरी काया पर सबका ध्यान होता है पर भीतर क्या है,

ये कितने जानना चाहते है?

अगर भाया नहीं रंग रूप फिर भी,

मन की सुदंरता के लिए कितने आगे आते है?

©®दीपिका

लम्हे जो बीत गए है।

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बीते कल की परछाई!

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जंग दिल और दिमाग की!

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हज़ारों बहाने है जीने के!

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गमों के बादल!

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वो एक फ़रिश्ता!

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इंसानियत कुछ खो सी गई है!

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लम्हे जो बीत गए है!

लम्हे जो बीत गए है, अब वापस कभी नहीं आएँगे।

चाहे अब उन्हें कितनी भी शिद्द्त से, फिर उनसे न मिल पाएँगे।

इसलिए कहते है कि आज में जिओ,

ये पल यादें ना बन जाएं, इन्हें संजोते चलो।

क्योंकि

लम्हे जो बीत गए है, अब वापस कभी नहीं आएँगे।

चाहे अब उन्हें कितनी भी शिद्द्त से, फिर उनसे न मिल पाएँगे।

जो भी करना चाहते हो, इसी पल में करो, इसी पल को जिओ,

कल कर लेंगे, कल कर लेंगे, इस आदत से बचो।

क्योंकि

कल क्या होगा, ये किसको पता?

कल की फ़िक्र में क्यूँ करे अपना आज लापता

बाद में तो पछताने के अलावा कुछ नहीं बचता,

क्यूँ जिए छलावे में जब आज हाथ में है शफ़ा।

क्योंकि

लम्हे जो बीत गए है, अब वापस कभी नहीं आएँगे।

चाहे अब उन्हें कितनी भी शिद्द्त से, फिर उनसे न मिल पाएँगे।

©®दीपिका

बीते कल की परछाई!

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जंग दिल और दिमाग की।

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बीते कल की परछाई!

बीते कल की परछाई!

लोग कहते है कि बीते कल में जिया नहीं करते,

हाथों से रेत फिसल जाने के बाद मुट्ठी मला नहीं करते।

पर बीते कल की परछाईयाँ आपका पीछा कहाँ छोड़ती है?

कितना भी भूलने की कोशिश करो, कहीं न कहीं जहन में जिंदा रहती है।

कभी हिम्मत तो कभी उदासी देती है,

कभी कुछ नाज़ुक पल की यादें तो कभी आगे बढ़ने की नसीहत देती है।

बहुत कुछ सीखते है हम बीते कल की परछाइयों से,

कुछ की गई गलतियों से तो कुछ उन्हें ना दोहराने की कोशिश में खुद से की गई लड़ाईयों से।

इतना भी आसां नहीं होता, अतीत से पीछा छुड़ा लेना,

पर मिलता क्या है याद करने से, ये भी एक गंभीर बहस का मुद्दा है।

अगर अच्छाई लेकर आगे बढ़ रहे है, तो फिर भी ठीक है,

पर गर “रंजिश ए गम” पाल रखा है तो बहुत मुश्किल है।

जल्द से जल्द बाहर निकलना होगा इन परछाइयों से,

बीते दिनों की मायूँसियों से और तन्हाईयों से।

सच है कि बीते कल में जिया नहीं करते।

हाथों में से रेत फिसल जाने के बाद मुट्ठी मला नहीं करते।

©®दीपिका

दिल और दिमाग़ की जंग!

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इंतज़ार अच्छे वक़्त का!

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हज़ारों बहाने जीने के!

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गमों के बादल!

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इंतज़ार अच्छे वक़्त का!

हम अच्छे वक़्त का इंतज़ार ही करते रहते जाते है,

कुछ पीछे छूट जाता है तो कुछ हम खुद छोड़ के आगे बढ़ जाते है।

ऐसा कर के कभी खुद को धोखा देते है,तो कभी किसी और से धोखा पाते है।

और फिर एक बार हम अच्छे वक़्त का इंतज़ार ही करते रह जाते है।

समय का पहिया गतिमान है किसी के लिए नहीं रुकता है,

हमें ही समझनी होती है उसकी गति और खुद ही सामंजस्य बिठाना पड़ता है।

गलती हमारी होती है और हम दूसरों पर दोष मढ़ते रह जाते है,

और हम फिर यूँ ही हाथ पर हाथ रखकर अच्छे वक़्त का इंतज़ार ही करते रह जाते है।

समय रहते ही चीजों को सुधारने की कोशिश की होती तो शायद नज़ारे कुछ और होते।

हमारे भी परिश्रम और सफलताओं के किस्से चहुँ ओर होते।

अच्छे वक़्त का इंतज़ार नहीं, अच्छा वक्त खुद के लिए कमाना पड़ता है।

खुद को हर उस हारी हुई सोच से ऊपर उठाकर जीत के क़ाबिल बनाना पड़ता है।

वरना हम अच्छे वक़्त का इंतज़ार ही करते रहते जाते है,

कुछ पीछे छूट जाता है तो कुछ हम खुद छोड़ के आगे बढ़ जाते है।

©®दीपिका

हज़ारों बहाने है जीने के!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/09/hazaro-bahane-hai-jeene-ke/

गमों के बादल!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/08/gamo-ke-baadal/

वो एक फ़रिश्ता!https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/06/vo-ek-pharista/

इंसानियत कुछ खो सी गई है!

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हज़ारों बहाने जीने के!

एक रास्ता बंद हो तो दूसरा खुल ही जाता है।मुश्किलों की जड़ें कितनी ही गहरी क्यूँ ना हो, हल निकल ही आता है।

असफलता बंद नहीं कर सकती है द्वार सफलता के,

अगर हल खोजे जाएं तो हज़ारों बहाने निकल ही आएंगे खुल के जीने के।

कितना आसान होता है, हार मान कर बैठ जाना,

ये तो मुझसे होगा ही नहीं, ऐसा सोचकर जंग लड़ने से पहले ही हथियार डाल देना।

शायद एक कोशिश एक नई आशा का द्वार खोल सकती है,

जो कल तक था असंभव, उस पर विश्वास की एक नई कोंपल अंकुरित हो सकती है।

जरूरत है तो बस थोड़ा धैर्य रखने की,लगातार कोशिशें करने की,

हिम्मत नहीं हारने की,बिगड़ी बनाने की और अनसुलझी सुलझाने की।

एक छोटी सी हार से क्यूँ जिंदगी अपने मायने खो देती है?

क्या सस्ती है जान इतनी कि हर चौराहे पर बोली लगा करती है।

विश्वास रखो कि

एक रास्ता बंद हो तो दूसरा खुल ही जाता है।मुश्किलों की जड़ें कितनी ही गहरी क्यूँ ना हो, हल निकल ही जाता है।

©® दीपिका

गमों के बादल!

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वो एक फ़रिश्ता!

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इंसानियत जो कुछ खो सी गई है।

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और भी दर्द है इस जमाने में।

चलिए आज बात करते है “बातें कुछ अनकही सी” में कुछ उस अनकहे दर्द के बारे में, जिसे कई बार हम समझ पाते है और कई बार जाने अनजाने अनसुना कर देते है अपनी ज़िंदगी की भाग दौड़ में।

और भी दर्द है इस ज़माने में

खुदगर्ज़ी की इन्तेहाँ तो देखो, वो दर्द भी दिए जाते है और “बेकसूर” भी कहलाते है,

क्या करे अपना दर्द बयां?

और भी दर्द है इस जमाने में, चलो किसी बंद दरवाजें को ताज़ी हवा के लिए खोल के आते है।

पैबंद तो कई है आज भी उसकी पोशाक पर,

पर नज़रों के वार उसके वजूद को तार तार किए जाते है।

और भी दर्द है इस जमाने में, चलो किसी बंद दरवाजें को ताज़ी हवा के लिए खोल के आते है।

बहुत बड़ी तादाद है अभी भी ऐसे लोगों की, जो कि सिर्फ अपने दर्द को सबसे बड़ा पाते है।

किसी की टूटी चारपाई और किसी की घिसी चप्पलें उनका “हाल ए दर्द” छुपा भी नहीं पाते है।

क्या कहे और क्या नहीं, इतना अंतर भी अपनी मासूमियत में समझ भी नहीं पाते है,

और भी दर्द है इस जमाने में, चलो किसी बंद दरवाजें को ताज़ी हवा के लिए खोल के आते है।

खुद गर्ज़ इतने भी ना बने कि खुदगर्ज़ी खुद शर्म के चोले में छुप जाए।

कोई भूखा, कोई बीमार सिर्फ़ मदद की आस में हाथ फैलाता ही रह जाए।

चलो कुछ कम करने की कोशिश करते है ऊँच नीच के फ़ासलें को और आधी आधी बाँट कर खाते है।

और भी दर्द है इस जमाने में, चलो बंद दरवाजों को ताज़ी हवा के लिए खोल के आते है।

©®दीपिका

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चलो फिर से शुरू करते है।https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/03/chalo-phir-se-shuru-karte-hai/

बेमक़सद जीना भी कोई जीना है?
https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/04/01/bemaksad-jina-bhi-koi-jina-hai/

पॉडकास्ट पर सुने

https://anchor.fm/deepika-mishra/episodes/DuaayeBlessings-ec1mq3

चलो फिर से शुरू करते है!

स्वागत है आप सभी लोगों का, “बातें कुछ अनकही सी” के तीसरे भाग में, जहां हम बात करेगें, एक नई शुरूवात की, अपनी चाहतों और कोशिशों की, तो देर न करते हुए चलिए शुरू करते है।

इस बड़ी सी दुनिया में अपनी छोटी सी जगह चाहती हूं।

जो दे दिल को सुकून और सपनों को उड़ान, वो ख़्वाब देखना चाहती हूं।

बहुत ज्यादा बड़ा ना सही, पर एक छोटा सा कोना अपने लिए चाहती हूँ।

बड़ी बड़ी इमारतें ना सही, एक अपना सा घरौंदा अपने लिए चाहती हूं।

इस बड़ी सी दुनिया में अपनी छोटी सी जगह चाहती हूं।

चलो फिर से शुरू करते है!

जो दिल में दबा हुआ है उसे एक नया रूप दे देते है,

क्या हुआ जो पूरी नहीं हुई कोशिश आज, चलो फिर से शुरू करते है।।

एक बार में ही सफलता मिल जाये ये कोई जरूरी तो नहीं है,

कोशिश करना तो हमारे हाथ में ही है, किसी ने रोका थोड़े ही है।

चंद कोशिशों के बाद हर मान लेना हमारी जीत की संभावनाओं को हमसे दूर कर देते है।

क्या हुआ जो पूरी नहीं हुई कोशिश आज, चलो फिर से शुरू करते है।

चींटी बार बार कोशिश करके भी थकती नहीं है,

जंग आत्म बल से जीती जाती है, इसका एक बेमिसाल उदाहरण पेश करती है।

क्या हम खुद के लिए खुद चुनौती नहीं बन सकते है।

क्या हुआ जो पूरी नहीं हुई कोशिश आज, चलो फिर से शुरू करते है

मन के हारे हार और मन के जीत होती है,

कठिनाइयाँ रास्ता जरूर रोक सकती है पर अंतिम अवसर जरूर देती है।

अब ये हम पर है कि हम क्या फैसला लेते है?

क्या हुआ जो पूरी नहीं हुई कोशिश आज, चलो फिर से शुरू करते है।

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/03/11/koshishe-2/

कविता सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें।

https://anchor.fm/deepika-mishra

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बेमक़सद जीना भी कोई जीना है?

बिना मक़सद की ज़िंदगी के बारे में सोच कर देखिए?

क्या महसूस होगा? कैसा महसूस होगा?

चलिए आज बात करते है “बातें कुछ अनकही सी” के दूसरे भाग में, इसी बेमक़सद ज़िन्दगी के बारे में।

जिसके बारे में पता नहीं है, क्या कर रहे है और क्यूँ कर रहे है?

बेमक़सद जीना भी कोई जीना है?

बिना मक़सद की ज़िंदगी जैसे पिंजरे में बंद पंछी की सी, जी तो रहा है पर न कोई उमंग है और ना कोई उत्साह।

ना कोई लक्ष्य, ना लक्ष्य को पूरा करने की चाह।।

लक्ष्य होना बहुत जरूरी है जीने के लिए,

वो ज़मीन तैयार करने के लिए, उन सपनों में रंग भरने के लिए।।

मक़सद ना हो तो बेमानी हो जाता है हर साथ और हर संग।

और खूबसूरत ज़िंदगी भी हो जाती है बदसूरत और बदरंग।।

कैसे सिर्फ एक लक्ष्य ज़िन्दगी जीने का मक़सद बदल देता है।

दिन सिर्फ़ एक दिन नहीं रहता है, साथ में रहता है एक जुनून जो कि रातों को सोने नहीं देता है।

अगर इस दुनिया में आए है तो एक निमित्त सबका तय ही होता है, ऐसा मेरा मानना है।

हो सकता है आप कुछ अलग सोच रखते हो इस बारे में, ये तो सबका अपना सोचने का तरीका है।

क्यूँ गवाँ देना इस मौक़े को यूँ ही सोने, उठने में?

ज्यादा सोचने में और आधे खाली गिलास की चर्चा में?

तय करो कि इस दुनिया से जाते वक़्त कोई ख़्वाहिश अधूरी ना रह जाए।

मन खोया खोया से और दिमाग उलझा उलझा से ना रह जाए।

आशा करती हूँ कि आज की अनकही बातें आपको पसंद आई होगी। मैं मिलती हूँ कल फिर आपसे, तब तक के लिए अपना ध्यान रखिये।

स्वस्थ रहिये, घर पर ही रहिए।

©®दीपिका

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/01/12/lakhsya-jarur-banao/

सुनिये इस कविता को!

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कल की पोस्ट यहाँ पढ़े।

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आप मेरी अन्य कविताओं को यहाँ सुन भी सकते है,

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मैं आशा!

हँसती और मुस्कुराती, मैं आशा हूँ।

निराशा को दूर भगाती और सबकी हिम्मत बढ़ाती, मैं आशा हूँ।

खड़ी हूँ यही चौखट पर तुम्हारी,

बस बंद दरवाज़े खोलने की देर है।

सोच रहे हो क्या तुम, किस उधेड़बुन में हो?

दोस्त तो बनो मेरे एक बार, किस आशंका में हो?

गर एक बार थामा मेरा दामन,

तो मैं जीवन भर साथ नहीं छोडूँगी।

चलूंगी संग संग तेरे, सपनों को उड़ान दूँगी।

गर गिर रहा होगा तो संभाल लूंगी।

और फिर से उठने का हौंसला दूँगी।

हँसती और मुस्कुराती, मैं आशा हूँ।

निराशा को दूर भगाती और सबकी हिम्मत बढ़ाती, मैं आशा हूँ।

©®दीपिका