गमों के बादल!

कैसे है आप सभी लोग? आशा करती हूं कि आप सभी लोग सकुशल अपने परिवार के साथ सुरक्षित होंगे।

चलिए “बातें कुछ अनकही सी,” के किस्से को आगे बढ़ाते है।

आज की कविता उस आशा के नाम, जिसका दीपक हम सभी के दिलों में जल रहा है। ज़ाहिर है कठिन वक्त है पर हौंसला नहीं खोना है।

गमों के बादल!

गमों के बादल छंट ही जाएंगे और फिर से रोशनी का नया सूरज निकलेगा।

फिर से खिल उठेगा आँगन, महकते फूलों की खुशबूओं से, फिर से ये वीराना चमन बनेगा।

आएंगे फिर से खुशियों के मौसम और फिर से कोई पगला दीवाना बनेगा।

सच है कि आसां नहीं होता, मायूँसियों के भँवर से बाहर निकलना,

पर ये भी सच है कि आशा की सिर्फ एक किरण से गमों का अंधेरा दूर भगेगा।

फिर से खिल उठेगा आँगन, महकते फूलों की खुशबूओं से, फिर से ये वीराना चमन बनेगा।

छोटी सी ही तो है ये ज़िन्दगानी, पता नहीं कब कौन आएगा और कब कौन चला जाएगा?

तो अच्छा है जब पता है इतनी बात, तो ये समझना और भी आसां हो जाएगा।

अगर साथ हो अपनों का तो हर मुश्किल का सामना करना आसां हो जाएगा।

पर गर हो अकेले तुम राहों में तो गम नहीं, खुद तेरा हौंसला ही तुझे राह दिखाएगा।

फिर से खिल उठेगा आँगन, महकते फूलों की खुशबूओं से, फिर से ये वीराना चमन बनेगा।

©® दीपिका

आशा करती हूं कि इस कविता ने थोड़ी सकारात्मकता जरूर दी होगी।

वो एक फ़रिश्ता!

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इंसानियत जो कुछ खो सी गई है!

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