मैं आशा!

हँसती और मुस्कुराती, मैं आशा हूँ।

निराशा को दूर भगाती और सबकी हिम्मत बढ़ाती, मैं आशा हूँ।

खड़ी हूँ यही चौखट पर तुम्हारी,

बस बंद दरवाज़े खोलने की देर है।

सोच रहे हो क्या तुम, किस उधेड़बुन में हो?

दोस्त तो बनो मेरे एक बार, किस आशंका में हो?

गर एक बार थामा मेरा दामन,

तो मैं जीवन भर साथ नहीं छोडूँगी।

चलूंगी संग संग तेरे, सपनों को उड़ान दूँगी।

गर गिर रहा होगा तो संभाल लूंगी।

और फिर से उठने का हौंसला दूँगी।

हँसती और मुस्कुराती, मैं आशा हूँ।

निराशा को दूर भगाती और सबकी हिम्मत बढ़ाती, मैं आशा हूँ।

©®दीपिका

कोशिशें

साँसें चल रही है तो उम्मीद अभी भी बाकी है।
हारी नहीं हूँ मैं, कोशिश अभी भी जारी है।

माना कि मुश्किलों भरी है राह मेरी और तूफानों का दौर है,
पर ढिगा नहीं है विश्वास मेरा, जंग अभी भी जारी है।

फिर उठूँगी गिर कर भी मैं, लड़खड़ाते क़दमों से भी,
कोई हो ना हो साथ मेरे पर ज़िन्दगानी अभी भी बाकी है।

भले ही जल गई हो लकड़ियाँ मेरे चूल्हे की,
पर उनकी राख अभी भी बाकी है।

जख्म हरे कर जाते है कुछ घाव पुराने भी,
आँखों में नमी हो भले ही पर होठों पर मुस्कान अभी भी बाकी है।

©®दीपिका

सुनिये पॉडकास्ट पर!

https://anchor.fm/deepika-mishra/episodes/Umeed-Abhi-Bhi-Baki-Hai-ebf502

कुछ तेरी,कुछ मेरी बराबरी वाली दुनिया।

कुछ तेरी, कुछ मेरी, कुछ आधी आधी ही सही।

मैं चाहती हूँ कुछ सुनना, कुछ सुनाना,कुछ तेरी अनसुनी और कुछ मेरी अनकही।

जहाँ मैं साझा कर सकूँ अपना मन बेझिझक,चाहती हूं वो दुनिया बराबरी वाली।

जहाँ तुम भी समझो मुझे और मुझ से जुड़ी हर फिक्र,चाहती हूँ वो दुनिया बराबरी वाली।

जहाँ मुझे रोका न जाए संस्कारों के नाम पर।
जहां बदल न जाए ज़िन्दगी सिर्फ एक नए रिश्ते में बंधने पर।

जहाँ मुझे तोला ना जाए दूसरों की बनाई कसौटियों पर।

जहाँ मैं खुद तय सकूँ कि बाहर जाकर काम करना है या होम मेकर बनकर रहना है घर पर।

जहाँ मैं जी सकूँ अपने हिस्से का जीवन और नाप सकूँ अपने हिस्से का आसमां।

जहाँ सिर्फ़ मुझे न दी जाएं बेटी,बीवी, बहूँ और एक माँ की उपमा।

कुछ तेरी, कुछ मेरी, कुछ आधी आधी ही सही।

मैं चाहती हूँ कुछ सुनना, कुछ सुनाना,कुछ तेरी अनसुनी और कुछ मेरी अनकही।

जहाँ मैं साझा कर सकूँ अपना मन बेझिझक,चाहती हूं वो दुनिया बराबरी वाली।

जहाँ तुम भी समझो मुझे और मुझ से जुड़ी हर फिक्र,चाहती हूँ वो दुनिया बराबरी वाली।

महिला दिवस की ढेरों शुभकामनाएँ

https://youtu.be/NcezMSrORwU

©®दीपिका

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/03/05/barabari-ka-daawa/

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं वो हूँ, जिसमें सृजन और विध्वंस की शक्ति है।

मैं वो हूँ, जो करती अपने परिवार की भक्ति है।

मैं वो हूँ, जिसे समझा जाता है कि वो कभी नहीं थकती है।

मैं वो हूँ, जो पैदा होने से मरने तक बिना रुके सबका पोषण करती है

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं वो हूँ जो अस्तित्व पर चोट लगने पर भी अपने पथ से नहीं डिगती है।

लगी रहती है खामोशी से सबके कामों में, वो चुप रहती है पर डरती बिल्कुल नहीं है।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

क्या समझा मैंने, क्या है नारी? क्या हूँ मैं?

मैं ये इसलिए नहीं बोल रही हूं कि मैं खुद एक नारी हूँ।मैंने समझा है जाना है इसे बड़े क़रीब से, ये एक विचित्र सी कलाकारी है।

ये एक नारी है।

ये एक नारी है।

मैंने देखा है उसे कई बार घुटते हुए,

और आँखें भीगी होने पर भी मुस्कुराते हुए देखा है।

वो तब तक उठाती नहीं है सवाल, किसी के क़िरदार पर,

जब तक उसे समझ नहीं आता है कि अब खतरा है उसके खुद के अस्तित्व पर।

पर सवाल उठाते ही क्यूँ उसकी परिभाषा बदल दी जाती है?

कुल की नाज़ से सबसे अनचाहा टुकड़ा कैसे वो बन जाती है?

ये एक नारी है।

ये एक नारी है।

क्यूँ नहीं सुनना और समझना चाहते लोग उसके भी पक्ष को।

वो भी उन्हीं पैमानों को जीती है जिस पर सही ठहराते है वो स्वयं को।

सीता भी वही है, काली भी है वो, कौनसे रूप में देखना चाहते हो उसको।

ये काफी हद तक निर्भर करता है आपकी अपनी समझ को।

प्यार पाकर दिल खोल के रख देती है वो अपना।

इतना भी आसां नहीं होता उसके लिए एक पराए घर को अपना बना लेना।

पर वो ये सब इसलिए कर लेती है क्यूँकि वो खुद को समझती है कि वो दो घरों का हिस्सा है।

पर दिल टूट जाता है उसका, जब उसे महसूस होता है कि वो तो बस एक अनकहा और अनछुआ क़िस्सा है।

ये एक नारी है।

ये एक नारी है।

दूसरों के नाम के साथ अपना नाम जोड़कर खुश हो जाती है।

ये तो वो संगम है जहाँ दरिया आकर मिल जाती है।

ये तो गागर है अथाह प्रेम की, बूँद बूँद से सागर बन जाती है।

देती है सर्वस्व अपना, अपनों की झोली खुशियों से भर जाती है।

ये एक नारी है। ये एक नारी है।

डरती नहीं है, झुकती नहीं है, खुद को ही चुनौती देती है हर दिन।

मकान घर नहीं बनता, बस होती है चार दीवारें इसके बिन।

ये एक नारी है। ये एक नारी है।

जो समझते है इसकी अहमियत को, सिर आँखों पर बिठाकर रखते है।

बहुत कुछ बदल रहा है तो कुछ और भी बदलने की इच्छा रखते है।

मैं करती हूँ सलाम उन लोगों को, जो मेरा साया बन मेरे साथ खड़े रहते है।

मेरी गलतियों को नज़रअंदाज़ कर मेरे हुनर को बढ़ावा दिया करते है।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

मैं हूँ आधी आबादी, मैं हूँ नारी।

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/08/30/aurat-teri-kahani/

“This post is a part of ‘The Woman That I Am’ Blog Hop #TheWomanThatIAm organized byRashi Roy and Manas Mukul #RRxMM. The Event is sponsored by Kraffitti

तन्हाईयाँ

भरी भीड़ में भी जो तन्हाईयाँ ढूंढ़ता है, वो मेरा अक़्स ही तो है जो एक मनपसंद आईना ढूंढ़ता है।

शायद उसको आदत हो गई है खुद ही कहकर खुद ही सुनने की,पर फिर भी हर दूसरे पल आहट पर बंद दरवाजा खोलता है।

भरी भीड़ में भी जो तन्हाईयाँ ढूंढ़ता है, वो मेरा अक़्स ही तो है जो एक मनपसंद आईना ढूंढ़ता है।

वो क्या समझेगा गुमनामी को उसकी?जो खुद गुमशुदा होकर अपना नाम पता पूछता है।

भरी भीड़ में भी जो तन्हाईयाँ ढूंढ़ता है, वो मेरा अक़्स ही तो है जो एक मनपसंद आईना ढूंढ़ता है।

चाहत को उसकी समझना इतना भी आसां नहीं है। जो ना आँखों से, ना ही शब्दों से अपना गम बयां करता है।

भरी भीड़ में भी जो तन्हाईयाँ ढूंढ़ता है, वो मेरा अक़्स ही तो है जो एक मनपसंद आईना ढूंढ़ता है।

©®दीपिका

https://www.instagram.com/p/B8whO53HnR9/?igshid=16xt8nrrrpeob

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/02/10/bejuba-pyar/