वो एक फ़रिश्ता!

क्या होती है परिभाषा एक फ़रिश्ते की?

आज की कविता इसी सवाल के नाम।

स्वागत करती हूँ आप सभी लोगों का एक बार फिर से “बातें कुछ अनकही सी” के अगले भाग में जहाँ आज खोज जारी है उस फ़रिश्ते की जिसे मैंने कल देखा था।

वो एक फ़रिश्ता!

कल देखा था मैंने एक फ़रिश्ता,

जो कि चिड़ियों को दाना चुगा रहा था,

प्यासों को पानी पिला रहा था और भूखों को खाना खिला रहा था।

चेहरे पर उसके तेज़ था जैसे कई सूरज मिलकर अपनी आभा बिखेर रहे हो।

अपने आशियानों से निकल कर किसी और का जीवन बदल रहे हो।

देखा तो लगा कि क्यूँ मैं भी ये नहीं कर सकती,किसी की आँखों का सपना और किसी की आत्मा को तृप्त क्यूँ नहीं कर सकती।

कल देखा था मैंने एक फ़रिश्ता,

जो कि चिड़ियों को दाना चुगा रहा था,

प्यासों को पानी पिला रहा था और भूखों को खाना खिला रहा था।

इससे बड़ी एक फ़रिश्ते की पहचान क्या हो सकती है!

जिसकी खुद की चादर फटी हो, जिसका खुद का पेट खाली हो,

पर ख़्वाहिश कितनों का तन ढ़कने की और उनका पेट भरने की हो।

तो सच में देव पुरुष है उपाधि का अधिकारी है।

कब कौन समझे तेरी भावनाओं को जो कहते तुझे कि अरे! ये तो खुद भिखारी है।

कल देखा था मैंने एक फ़रिश्ता,

जो कि चिड़ियों को दाना चुगा रहा था,प्यासों को पानी पिला रहा था और भूखों को खाना खिला रहा था।

©®दीपिका

इंसानियत जो कुछ खो सी गई है।

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और भी दर्द है इस ज़माने में!

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चलो फिर से शुरू करते है!

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पॉडकास्ट सुने।

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