छुट्टी वाला संडे?

उमा और निशा बचपन की सहेलियाँ थी, शादी के काफी सालों के बाद दोनों एक दूसरे से मिल रही थी।

चाय की चुस्की लेते हुए उमा ने निशा से पूछा “इस संडे का क्या प्लान है तुम्हारा”? फ्री हो तो मूवी के लिए चलते है?

निशा बात को टालते हुए बोली “नहीं यार, बिल्कुल टाइम नहीं है, बहुत बिजी हूँ।”

उमा सुनकर थोड़ा हैरान हुई, तू मना कर रही है और मूवी के लिए, विश्वास नहीं होता। एक टाइम था तू “फर्स्ट डे फर्स्ट शो” क्वीन के नाम से पूरे कॉलेज में फेमस थी।

“नहीं यार, मना कर दिया ना, नहीं हो पायेगा। क्यूँ बेवजह की ज़िद कर रही है?” निशा से झिड़कते हुए बोला।

“अरे निशा, कौनसा भैया को ऑफिस जाना होता है और बच्चों को स्कूल?” इतना टाइम तो निकाल ही सकती है तू अपने लिए। कौनसा पूरा दिन मांग रही हूँ तुझसे, 3 घंटे की ही तो बात है।

“तेरे लिए तीन घंटे होगें मेरे लिए तो 3 दिन का काम बढ़ जाएगा।”

“क्या हुआ निशा परेशान लग रही है,” उमा ने चाय का कप टेबल पर रखते हुए बोला।

“क्या बताऊँ यार, मेरे लिए हफ्ते के सातों दिन और साल के 365 दिन बराबर है। कोई “संडे”नहीं, कोई छुट्टी नहीं, उल्टा संडे को तो रोज की तुलना में दुगुना काम हो जाता है और कोई हाथ बंटाने वाला नहीं है।”

इतना कहकर निशा रुक सी गई और आँखों की नमी को छुपाने की कोशिश करने लगी।

उमा को समझने में देर नहीं लगी, उसने बात आगे बढाते हुए पूछा कि “क्यूँ उसकी कोई मदद नहीं करता?”

“तू भी ना एकदम झल्ली है, कौन मदद करेगा मेरी?”, मम्मीजी तो अक्सर बीमार ही रहती है, वो तो एक कप चाय भी बनाकर नहीं पीती अपने आप से।ठीक हो तो भी और कुछ परेशानी हो तो बात की अलग है। इनका तो पूरा दिन ही आफिस में निकल जाता है और बचा कौन बच्चे। उनकी उम्र थोड़े ही मदद करवाने की।”

“मैं तो तरस गयी हूँ एक अदद संडे के लिए, किसी को कोई फ़र्क भी नहीं पड़ता कि मुझे भी अपना संडे चाहिए, जब मैं भी देर तक सो सकूँ, सबका मनपसंद नाश्ता और खाना बनाने से छुट्टी मिल सके। मैं भी देर तक बैठकर अपना मनपसंद प्रोग्राम एन्जॉय कर सकूँ।

उमा ने निशा का हाथ अपने हाथ में लिया और समझाते हुए बोली कि “इसमें जितनी गलती उन लोगों की है उससे ज्यादा तुम्हारी है।अपने हक़ की आवाज़ तुम्हें खुद उठानी चाहिए।”

“सबका ख्याल रखना अच्छी बात है पर अपने बारे में सोचना भी उतना ही जरुरी है। सबको ये एहसास करवाना कि तुम सब कुछ कर सकती हो और तुम्हें किसी की मदद नहीं चाहिए, ये भी गलत है।”उमा बोली।

उन्हें भी ये पता लगना चाहिए कि सारी जिम्मेदारियाँ अकेले उठाना कोई मज़ाक बात नहीं है। अगर तुम नहीं बोलती हो तो भी उनका फर्ज़ बनता है कि आगे बढ़ कर पूँछे। उमा लगातार बोले जा रही थी और निशा सुन्न होकर उसकी बातें सुनती ही रही।

उमा तूने तो मेरी आँखें खोल दी कैसे शुक्रिया करूँ मेरी दोस्त,आँसू पोंछती हुई निशा बोली। आज ही मैं सबसे बात करती हूँ और हाँ अगले संडे के लिए टिकट बुक करके रखना, मैं जरुर आऊँगी।

निशा के चेहरे पर मुस्कान थी और उमा अपनी दोस्त को मुस्कुराते हुए देख कर मानों सातवें आसमां पर थी।

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/12/03/sunday-ki-talaash/

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©®दीपिका