कुछ तेरी,कुछ मेरी बराबरी वाली दुनिया।

कुछ तेरी, कुछ मेरी, कुछ आधी आधी ही सही।

मैं चाहती हूँ कुछ सुनना, कुछ सुनाना,कुछ तेरी अनसुनी और कुछ मेरी अनकही।

जहाँ मैं साझा कर सकूँ अपना मन बेझिझक,चाहती हूं वो दुनिया बराबरी वाली।

जहाँ तुम भी समझो मुझे और मुझ से जुड़ी हर फिक्र,चाहती हूँ वो दुनिया बराबरी वाली।

जहाँ मुझे रोका न जाए संस्कारों के नाम पर।
जहां बदल न जाए ज़िन्दगी सिर्फ एक नए रिश्ते में बंधने पर।

जहाँ मुझे तोला ना जाए दूसरों की बनाई कसौटियों पर।

जहाँ मैं खुद तय सकूँ कि बाहर जाकर काम करना है या होम मेकर बनकर रहना है घर पर।

जहाँ मैं जी सकूँ अपने हिस्से का जीवन और नाप सकूँ अपने हिस्से का आसमां।

जहाँ सिर्फ़ मुझे न दी जाएं बेटी,बीवी, बहूँ और एक माँ की उपमा।

कुछ तेरी, कुछ मेरी, कुछ आधी आधी ही सही।

मैं चाहती हूँ कुछ सुनना, कुछ सुनाना,कुछ तेरी अनसुनी और कुछ मेरी अनकही।

जहाँ मैं साझा कर सकूँ अपना मन बेझिझक,चाहती हूं वो दुनिया बराबरी वाली।

जहाँ तुम भी समझो मुझे और मुझ से जुड़ी हर फिक्र,चाहती हूँ वो दुनिया बराबरी वाली।

महिला दिवस की ढेरों शुभकामनाएँ

https://youtu.be/NcezMSrORwU

©®दीपिका

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/03/05/barabari-ka-daawa/

बराबरी का दावा

हम औरतें क्यूँ हक दे देती है किसी और को खुद पे सवाल उठाने का। जब एक आदमी सम्पूर्ण हो सकता है अपनी खामियों के साथ तो एक औरत क्यूँ नहीं?

हम खुद अपनी बराबरी का दावा कम दे देते है खुद की कमियों को बड़ा मानकर। खुद को परफ़ेक्ट दिखाने की हौड़ में शामिल होकर। हमने ही शुरू की है ये दौड़ शायद।बिना रुके लगातार दौड़ते रहने की आदत।

शिखा डिप्रेशन में चली गई रही आयुष को जन्म देने के बाद। उसके माँ बनते ही परिवार की तरफ़ से ढेरों हिदायतें आने लगी थी और ताने भी कि तुम्हें ये भी नहीं आता,वो भी नहीं सिखाया तुम्हारी माँ ने।

हमने भी सब अकेले ही संभाला था कोई नहीं था हमें भी बताने वाला। शिखा को लगता था कि वो ही बस माँ बनी है, शेखर तो बाप बने ही नहीं, क्यूँ उन्हें नहीं कोई समझाता कि उन्हें भी अब बहुत कुछ बदलना होगा।

ये शिखा की ही नहीं उन हज़ारों लाखों औरतों की कहानी है जो पहली बार माँ बनती है। पूरी ज़िंदगी 360° घूम जाती है और शिकार हो जाती है निराशा का।

बात यहाँ पर माँ बनने की ही नहीं है और भी कई ऐसे पहलू है जिसमें हम औरतें दूसरों की ऐनक से देखे जाने लगते है।

क्यूँ हम औरतें विश्वास नहीं करती खुद की क़ाबिलियत पर और हार मान लेती है अगर कोई सवाल उठा देता है कि तुम्हें ये नहीं करने आता एक औरत होकर या तुम एक अच्छी माँ नहीं हो, या अच्छी बीवी नहीं हो वगैरह वगैरह जबकि कि हमें पता है कि हम है, हमने वो सब भी किया है जो हमें आता तक भी नहीं था या जिसके बारे में सोचा तक नहीं था। तो कैसे कम हो सकते है हम?

कोई बात नहीं है अगर परफ़ेक्ट नहीं है, हम भी एक इंसान ही है हाड़ मांस का शरीर, कोई मशीन नहीं, कोई कठपुतली नहीं, जिसकी डोर हमेशा दूसरे के हाथ में हो। हमें भी उड़ना पसंद है, अपनी मर्ज़ी से जीना पसंद है पर अगर हम अपनी इच्छाओं को बाज़ू रख परिवार को पहला दर्ज़ा देते है या नहीं भी देते है तो इससे कुछ नहीं बदलना चाहिए हमारी परिभाषा में।

और बदलता भी है तो अब मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्यूंकि मैंने खुद को बराबरी का दर्ज़ा दिया है। मैनें अपने पंखों को खुद उड़ने का हौंसला दिया है।
मैंने खुद को बराबरी का हक़ दिया है। मैं खुद को स्वीकार करती हूँ मैं जैसी भी हूँ, किसी और की तारीफ़ों की मोहताज़ नहीं, मैं खुद में सक्षम हूँ, दिल छोटा नहीं करती अगर नहीं खरी उतर पाती दूसरों की अपेक्षाओं पर।

मैंने उड़ना सीख लिया है, खुद को खुद से जोड़ लिया है।मिले ना मिले तवज़्ज़ो मेरी ख्वाहिशों को, मैंने खुद अपनी तस्वीर में रंग भरना सीख लिया है।

©®दीपिका