कुछ सवालों का जवाब ढूंढ़ना ही होगा।

जो भाईचारे को भी धर्म की दृष्टि से देख रहे है वो हमारे पड़ोसी नहीं हैं।

वो तो कोई और है।

हमारे पड़ोसी तो आज भी वही लोग है जो हमारी मदद को हमारे परिवार से भी पहले आगे आते है।

ये जो हिंसा हो रही है उसमें आप जैसे, हम जैसे लोग शामिल है, इस पर अभी भी विश्वास नहीं होता।

क्यूँकि बेगुनाहों का घर यूँ ही उजाड़ देना तो हमारी संस्कृति नहीं है।^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

कौन है वो लोग जो कत्लेआम मचा कर चले गए।
चंद लोग फिर भी हिन्दू मुस्लिम की राजनीति में लग गए।

क्यूँ?अपने आस पास देखती हूँ तो बंटवारा नज़र नहीं आता।

फिर वो कौन लोग है जिन्हें भारत को बँटा हुआ बताने में ही मज़ा आता।

क्यूँ?कुछ चंद लोगों को बिल्कुल हक नहीं है सबका नुमांइदा बनने का।

आश्चर्यचकित हूँ कैसे हम देख रहे है इस दरिंदगी को और बन रहे है उस भीड़ का हिस्सा।

क्यूँ?किसी की गलती करने पर उससे बड़ी गलती करना हमारी समझ तो नहीं है।

क्या कर रहे है हम? क्यूँ डर रहे है हम? किससे छिप रहे है हम?

इन सवालों का जवाब शायद हमारे पास नहीं है।इन सवालों का जवाब अब हमें ढूंढ़ना ही होगा।

क्या चल रहा है? क्यूँ चल रहा है? समझना ही होगा।

©®दीपिका

वो दस साल!

“अपने आप को पा लेना आसां नहीं होता,

सब कुछ पा लेने के बाद भी मन शांत क्यूँ नहीं होता?

क्यूँ भेद देते है उसके खुद के सवाल खुद को ही,

खुद अपने सवालों का जवाब बन पाना आसां नहीं होता।”

दस सालों का सफ़र

ये सफ़र है उस साधारण सी निम्न मध्यम परिवार की हरफनमौला लड़की का जिसका कद भले ही सामान्य हो पर ख़्वाब बहुत ऊँचे थे।

ये बात है 2009 की, जब वो अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही थी। पढ़ने में बहुत अच्छी थी इसलिये डिस्टिंक्शन से पास हुई थी। आगे बी.एड करने का विचार था। एंट्रेंस परीक्षा भी दे चुकी थी और जाहिर था कि सेलेक्ट भी हो ही चुकी थी बस कॉउंसलिंग बाकी थी। सब कुछ नार्मल सा ही चल रहा था उसकी जिंदगी में।

पर इसी बीच उसकी ज़िन्दगी में एक मोड़ आता है और 2010 में उसकी शादी हो जाती है। मिली जुली सी फीलिंग होती है उसकी, जहाँ एक तरफ़ बी.एड ना कर पाने का दुख था तो दूसरी तरफ़ ख़ुशी थी उसको अपने जीवनसाथी से मिलने की।

“नया सफ़र था ये, वो नई शुरुवात कर रही थी

कहीं गम था अपनों से बिछड़ने का तो वही नए अपनों का भी स्वागत कर रही थी।

पर वो अंजान थी इस नए सफ़र की चुनौतियों से, ये वक़्त था उसका असली ज़िन्दगी से मिलने का। अब तक जो अपनी छोटी बड़ी जरूरतों के लिए अपने मम्मी पापा पर आश्रित थी अब अचानक से उसकी भूमिका बदलने वाली थी। इसका अंदाज़ा तो था उसे पर गंभीरता का पता नहीं था।

एक नई जगह, एक नया शहर अब इंतज़ार कर रहा था उसका। पूरी गृहस्थी जमानी थी उसे।एक एक बर्तन, एक एक कोना सजाना था उसे अपने प्यार से। कर रही थी वो ये सब बड़े प्यार के साथ।

पर ये तो शुरुआत थी उसकी चुनौतियों भरे सफ़र की क्योंकि बहुत ही जल्दी फिर उसका किरदार बदलने वाला था, अभी तक जो एक पत्नी थी उसे माँ का दर्ज़ा मिलने वाला था। अभी तक जो अपनी पत्नी और बहु की जिम्मेदारियों को ही ठीक से समझ नहीं पाई थी वो जल्द ही माँ बनने वाली थी।

वह स्तब्ध थी अपनी ज़िंदगी में इतनी जल्दी जल्दी बदलते अपने किरदारों को लेकर। खुश भी थी और घबराई हुई भी कि क्या वो अभी तैयार है अपने जीवन में इतने बड़े बदलाव के लिए?

और शायद भगवान भी नहीं थे इसलिए दो महीनों के बाद उसका गर्भपात हो जाता है।

“टूट कर बिख़र जाना उसकी फितरत नहीं।

वो तो बंज़र ज़मीन पर भी चंद बूँदों की दुआ करती है।”

पर विधि का विधान देखिये वो फिर उम्मीद से होती है और 2011 में ही एक सुंदर सी बिटिया को जन्म देती है।

खुश थी वो पर बहुत से लोग खुश नहीं थे लड़की जो पैदा हुई थी। “आज भी हमारे समाज़ में लड़के का पैदा होना ज़्यादा जरूरी और खुशी का अवसर मन जाता है, लड़की के पैदा होने से”

जैसे तैसे वो अपने आप को इन परिस्थितियों में ढ़ालने की कोशिश करती थी लेकिन तब तक फिर एक नई चुनौती उसका इंतज़ार कर रही होती है इसी बीच उसके पति का ट्रांसफर हो जाता है और फिर वही चक्र एक बार फिर घूमता है।

एक नई जगह ,नया शहर, नए लोग फिर उसका इंतजार कर रहे होते है और नई चुनौतियाँ भी।कुछ दिनों बाद उसकी बेटी का पहला जन्म दिन होता है।वो बहुत खुश थी अपनी बेटी को अपनी आँखों के सामने बड़ा होते देख कर।

पर अचानक ही पहले जन्मदिन के कुछ दिन बाद ही उसकी बेटी गंभीर रूप से बीमार हो जाती है, जाँच से पता चलता है कि उसे निमोनिया है वह सिहर सी उठती है।

और वो पाँच दिन एक भयानक एहसास लेकर आते है उसके लिए। उसकी बेटी पाँच दिन अस्पताल में भर्ती रहती है,इलाज़ के लिए।

इतनी छोटी बच्ची को इतने दर्द से गुजरते देखना उसके लिए भी किसी यातना से कम नहीं था।ये दो साल वो सब कुछ भूल जाती है क्यूँकि हर बदलता मौसम उसकी बेटी को एक नई तकलीफ़ देकर जाता था और वो बस डॉक्टर और घर के बीच की दूरी ही तय करती रह जाती थी।

भले ही उसकी परिस्थितियाँ बदल गयी थी पर उसके अंदर की आस और आत्मविश्वास अभी भी जिंदा था। वो कुछ करना चाहती थी अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी आत्मनिर्भर बनना चाहती थी इसलिए जैसे ही उसकी बेटी स्कूल जाने के लायक हुई उसने भी 2013 में स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया।

“आए कई इम्तिहान, तोड़ना भी बहुत चाहा,

मगर हम भी अड़ियल है जनाब!

फिर कभी आना कहकर, बाइज़्जत रुख़सत कर दिया।”

परिवर्तन चूँकि संसार का नियम है इसलिए चीज़ें तो फिर बदलने वाली ही थी, 2014 में फिर से उसके पति का ट्रांसफर हो जाता है और उसे स्कूल छोड़ना पड़ता है, ये निर्णय आसान नहीं होता है उसके लिए।

फिर से उन्हें एक नए शहर की तरह रुख करना पड़ता है। पर अब धीरे धीरे उनकी चुनौतियाँ बढ़ने लगी थी, वो शरीर से ही नहीं पर अब मन से भी थकने लगी थी पर समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे?

“मुद्दतों से किसी ने अपने ख्वाबों को सोने नहीं दिया।

चाहे कितनी भी मुश्किलें आई पर उन्हें खुद पर हावी नहीं होने दिया”।।

एक और साल 2015 इसी उधेड़बुन में निकल जाता है उसकी बेटी अब थोड़ी और बड़ी हो गयी थी इसलिए वो फिर से अपनी टीचिंग शुरू करना चाहती थी पर कुछ जमता नहीं है उसे इस नई जगह पर।

“खुश रहना जिसकी आदत हो वो तो आंसुओं से भी अपनी प्यास बुझा लेता है।

हर चोट देने वाले को भी फिर एक बार गले से लगा लेता है।।”

वह अपने करियर के बारे में सोच ही रही होती है कि यही समय है अपने जीवन को एक नई दिशा देने के लिए कि 2016 में वो फिर से माँ बनती है। और अबकी बार एक नहीं दो दो बच्चों की ज़िम्मेदारी होती है उसके कंधों पर।

फिर 2 साल भूल गयी थी वो अपने बारे में सब कुछ। अपना लक्ष्य, अपना सपना कुछ याद नहीं आता था उसे और न ही इतनी ताक़त बची थी उसमें। उसके लिए उसके बच्चे ही अब उसकी ज़िन्दगी थे।

“पर जितना हम सोचते है उतना आसां नहीं होता है, अपने सपनों से पीछा छुड़ाना।

वो सोने नहीं देता है आपको और कोई राह न दिखे तो जीने भी नहीं देता है।

एक हँसती खेलती लड़की कब चिड़चिड़ेपन का शिकार हो जाती है उसे खुद भी पता नहीं चलता।वो खुद से लड़ने लग जाती है अपनी गलतियों के लिए। आत्म विश्वास बिखर सा जाता है उसका।

पर जो नहीं टूटती है वो है उसकी हिम्मत, उसका विश्वास। अब उसने सोच लिया था कि वो अपने सपनों को किसी भी हाल में मरने नहीं देगी।

अपने बेटे के 2 साल के होने के बाद 2018 में उसने अपने लिए उपलब्ध सभी सम्भावनाओं को टटोलने के बाद अपना रास्ता खुद बनाया। लेखन में अपनी रुचि को पहचानते हुए उसने लिखने का फैसला किया, किसी और के लिये नहीं, अपने लिए।

और वो आज आप सबके सामने है।

2019 का साल उसके लिए उपलब्धियों का साल था, बहुत कुछ पाया उसने, एक बार जो कदम आगे बढ़ाया उसने तो फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। आज भी हर दिन एक नई चुनौती है पर वो हर दिन कुछ सीखने की चाह में निरंतर बिना रुके लगी हुई है।

“बिना मकसद के जीना भी कोई जीना है।

सिर्फ आना और चले जाना मेरा किरदार नहीं है।”

2020 की भी शुरुवात एक सकारात्मक उपलब्धि से हुई है।

कुछ पंक्तियाँ लिखी है अपने दस सालों के सफ़र पर।

ज़िंदगी दिखाती है कई रंग, जिस चश्मे से देखो, वो ही नज़र आता है।

कभी ठहर जाते है पल खुशी के तो कभी सब धुँधला नज़र आता है।।

दस सालों का है ये सफ़र मेरा, कोई अनचाहा ख़्वाब नहीं है।

खुद को खोजा है, पाया है मैंने, सुनिए जनाब ये कोई मज़ाक नहीं है।।

शुरू किया था सफ़र ये मैंने, एक अल्हड़ सी बेफिक्र लड़की से।

पता नहीं था तब मुझे कुछ, और लेती नहीं थी रिश्तों को भी गंभीरता से।।

खुश थी शायद वो, पर अंदर ही अंदर कुछ कचौट रहा था।

दूसरों से क्या गिला करे, ये तो खुद का खुद से ही अंतर्द्वंद्व चल रहा था।।

जब ढान लिया उसने तो सब कुछ इतना आसां सा लगने लगा था।

मन पंख लगा कर खुले आसमां में उन्मुक्त पंछी की तरह उड़ने लगा था।।

दीपिका
“This post is a part of ‘DECADE Blog Hop’ #DecadeHop organised by #RRxMM Rashi Roy and Manas Mukul. The Event is sponsored by Glo and co-sponsored byBeyond The Box, Wedding Clap, The Colaba Store and Sanity Daily in association with authors Piyusha Vir and Richa S Mukherjee”

अलविदा 2019!

बीत गयी जो बात गयी, बीती सारी बिसार दे।
आशाओं के फूल खिला और मायूसियों को निथार दे।।

हिम्मत, साहस और विश्वास है सारथी तेरे राह के।
अपनी नियति तू खुद तय कर, सारी आशंकाओं को भुला के।।

नयी डगर है ये, नया आगाज़ है, दस्तक है नए सहर की।
गर कोशिशों में है शिद्दत पूरी तो फिर क्या फ़िक्र मुश्किलों की।।

संजोकर सारी सुहानी यादों को, वादा करते है कुछ और नयी यादें बनाने का।
ससम्मान अलविदा करते है 2019 को और दिल से स्वागत करते है नए साल 2020 का।

नया साल मुबारक आप सभी को।

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Alvida 2019! Welcome 2020! बीत गयी जो बात गयी, बीती सारी बिसार दे। आशाओं के फूल खिला और मायूसियों को निथार दे।। हिम्मत, साहस और विश्वास है सारथी तेरे राह के। अपनी नियति तू खुद तय कर, सारी आशंकाओं को भुला के।। नयी डगर है ये, नया आगाज़ है, दस्तक है नए सहर की। गर कोशिशों में है शिद्दत पूरी तो फिर क्या फ़िक्र मुश्किलों की।। संजोकर सारी सुहानी यादों को, वादा करते है कुछ और नयी यादें बनाने का। ससम्मान अलविदा करते है 2019 को और दिल से स्वागत करते है नए साल 2020 का। #deepikamishra #newyearwishes #alvida2019 #welcome2020 #myaspiringhope #deepikawrites #mommyblogger #Inspirationalblogger #ahmedabadblogger

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©®दीपिका

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कद बड़ा या सोच?

शालिनी चुलबुली सी और प्यारी सी एक लड़की थी जो हमेशा हँसती खेलती रहती थी। पढ़ाई में अव्वल, खेल कूद में आगे, घर के कामों में निपुण। सब कुछ परफेक्ट सा था उसका। किसी का दिल दुखाना क्या होता है? उसे पता तक नहीं था, अपनी दुनिया में मस्त एक ज़िम्मेदार लड़की, बस एक ही कमी थी उसमें लोगों के हिसाब से, उसकी हाइट।

हाँ, छोटे कद की थी वो और उसकी इस शारीरिक कमी के लिए उसे न जाने क्या क्या सुनना पड़ता था? मानों उसके हाथ में था ये सब! उसने जानबूझकर अपना कद कम किया हो।

उसकी सारी अच्छाइयों को छिपाने के लिए उसके कद को जरिया बनाया जाता था। उसे जताया जाता था हमेशा की वो छोटी है, उसका मजाक बनाया जाता था कि ये नहीं कर सकती वो, यहाँ नहीं पहुँच सकती वो, ये तो इसके बस का ही नहीं है, वगेरह वगेरह।

शालिनी को बुरा तो बहुत लगता था पर वो उन्हें जवाब देना जरुरी नहीं समझती थी। उसने सोच लिया था कि वह लोगों के तानों का जवाब अपने हुनर से देगी, अपने काम से देगी, उनसे लड़ कर नहीं। जैसे जैसे उसकी उम्र शादी के लायक होती गई लोगों के ताने भी बढ़ गए पर उसने परवाह नहीं की।

धीरे धीरे शालिनी की माँ से भी कहा जाने लगा कि “तुम्हारी लड़की की हाइट तो छोटी है, कोई अच्छा लड़का नहीं मिलेगा तुम्हारी शालिनी को”। शालिनी की माँ भी पलट कर जवाब में बिना हिचके कह ड देती थी कि “क्या कमी है मेरी बेटी में? जो उसकी खूबियों को नहीं समझते उनमें और उनकी सोच में कमी है, मेरी बेटी में नहीं।”

शालिनी की माँ लोगों से तो कह देती थी पर मन ही मन वो भी जानती थी लोगों की सोच को और डरती थी अपनी बेटी के भविष्य को लेकर। उसने कभी भी शालिनी को जाहिर नहीं होने दिया पर शालिनी समझ गयी थी अपनी माँ की चिंता को।

उसने माँ से आगे बढ़कर बात की और उसे समझाया, “माँ आप चिंता मत करो।” जो इंसान मेरे व्यक्तिव से नहीं, मेरे बाहरी रंग रूप से मेरी पहचान करेगा वो ज़िंदगी भर मेरा साथ क्या निभायेगा? मैं जैसी हूँ,वही मेरी पहचान है।

वो आगे बोली, “माँ आपने वो कहावत तो सुनी होगी की “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर? पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।”

मैं अपनी कमी को अपनी ताकत से हरा दूंगी। और तब ही शादी करुँगी जब मुझे, मैं जैसी हूँ वैसे ही स्वीकार किया जाएगा और वो भी सम्मान के साथ, तब तक हम इस बारे में बात भी नहीं करेंगे।

शालिनी लोगों की कही बातों को पीछे छोड़ कर और अपनी माँ को समझाकर अपनी आईएस की परीक्षा की तैयारी में पूरे जोर शोर से लग गयी, “अब उसका एक ही लक्ष्य था अपनी योग्यता से अपने व्यक्तिव की पहचान बनाना ना की अपने कद से।”

रिजल्ट आया तो सब हैरान हो गए, शालिनी ने पहले ही प्रयास में आईएस क्लियर कर लिया था और साथ में ही कर दिया उन सभी लोगों का मुँह बंद जो हमेशा उसे कोसने के लिए ही मुँह खोलते थे।

कुछ ही महीनों में उसने अपने व्यक्तिव से,अपने काम से अपनी एक अलग पहचान बना ली थी और बना ली थी जगह समीर के दिल में भी। समीर शालिनी को अपना जीवन साथी बनाना चाहता था उसकी अच्छाइयों की वजह से न कि वो कैसी दिखती है इस वजह से।

शालिनी बहुत खुश थी कि उसकी खोज पूरी हो गयी उसे वो मिल गया जिसकी सोच उसकी सोच से मेल खाती है।

कैसी लगी आज की कहानी, कमेंट करके जरूर बताये।और अगर अच्छी लगी हो तो फॉलो जरुर करे।

©®दीपिका

ज़िंदगी को जिताना है।

जब भी सुनती हूँ किसी आकस्मिक निधन के बारे में, जिसका ताल्लुक आत्महत्या से होता है तो मन में ढेरों सवाल कौंध जाते है।

सवाल बदलते परिवेश के बारे में, सवाल जो कि मुझे अन्दर तक झकझोर जाते है।

मन सिहर उठता है उन भावनायों के बारे में सोचकर कि क्यूँ किसी ने ऐसा फैसला लिया होगा?

क्यूँ आइडियल ज़िंदगी की परिभाषा को धता बता कर अपना जीवन खत्म कर लिया होगा।

शायद उसे विश्वास हो चलता है कि उसके रहने ना रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

या खुद को वो और घुटता हुआ नहीं देख सकता।

एक कमज़ोर पल उससे क्या से क्या करवा जाता है?

अगर थोड़ी सी हिम्मत दिखाता इस मुश्किल घड़ी में तो शायद खुद को अपनों के बीच में खड़ा पाता।

हम कोई नहीं है किसी की निजी ज़िंदगी में झांकने वाले।

पर अगर बाँट कर दुख कम हो सकता है तो क्यूँ नहीं,हम भी नहीं पीछे हटने वाले।

सवाल उठता है।

क्यूँ हार जाती है ज़िंदगी, मौत की बाहों में?
सब कुछ पाकर भी क्यूँ खो जाती है अंजानी राहों में?

शायद बात कर पाना उसके लिए बहुत मुश्किल होता होगा।
सूझती होगी ना कोई सूरत ना सीरत, हर जख्म दर्द देता होगा।

इंसानी रिश्तों से बढ़कर कुछ नहीं होता।
गर बाँटा होता दर्द उसका भी तो शायद आज वो भी ज़िन्दा होता।

क्यूँ भूल जाते है, बंद किवाड़ों के पीछे भी एक कहानी होती है।
अगर आती सुकून भरी हवा खिड़कियों से तो शायद कुछ और रवानी होती।

बस यही गुजारिश

“हो सके तो हर एक जिंदगी के लिए जीने की कोशिश करे।

हारे खुद को ना, उस गलत सोच को ही हरा दे।”

©®दीपिका

यहाँ देखिये

“रुक जाना नहीं तू कभी हार के”

https://youtu.be/1xWrKHE7dAA