कुछ तेरी,कुछ मेरी बराबरी वाली दुनिया।

कुछ तेरी, कुछ मेरी, कुछ आधी आधी ही सही।

मैं चाहती हूँ कुछ सुनना, कुछ सुनाना,कुछ तेरी अनसुनी और कुछ मेरी अनकही।

जहाँ मैं साझा कर सकूँ अपना मन बेझिझक,चाहती हूं वो दुनिया बराबरी वाली।

जहाँ तुम भी समझो मुझे और मुझ से जुड़ी हर फिक्र,चाहती हूँ वो दुनिया बराबरी वाली।

जहाँ मुझे रोका न जाए संस्कारों के नाम पर।
जहां बदल न जाए ज़िन्दगी सिर्फ एक नए रिश्ते में बंधने पर।

जहाँ मुझे तोला ना जाए दूसरों की बनाई कसौटियों पर।

जहाँ मैं खुद तय सकूँ कि बाहर जाकर काम करना है या होम मेकर बनकर रहना है घर पर।

जहाँ मैं जी सकूँ अपने हिस्से का जीवन और नाप सकूँ अपने हिस्से का आसमां।

जहाँ सिर्फ़ मुझे न दी जाएं बेटी,बीवी, बहूँ और एक माँ की उपमा।

कुछ तेरी, कुछ मेरी, कुछ आधी आधी ही सही।

मैं चाहती हूँ कुछ सुनना, कुछ सुनाना,कुछ तेरी अनसुनी और कुछ मेरी अनकही।

जहाँ मैं साझा कर सकूँ अपना मन बेझिझक,चाहती हूं वो दुनिया बराबरी वाली।

जहाँ तुम भी समझो मुझे और मुझ से जुड़ी हर फिक्र,चाहती हूँ वो दुनिया बराबरी वाली।

महिला दिवस की ढेरों शुभकामनाएँ

https://youtu.be/NcezMSrORwU

©®दीपिका

https://myaspiringhope.wordpress.com/2020/03/05/barabari-ka-daawa/

28 thoughts on “कुछ तेरी,कुछ मेरी बराबरी वाली दुनिया।

  1. Apki har poem bahut achi hoti hai, i have read many poems of ur s, thid is some thing I liked for womensday especially

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  2. Such a touchy and soulful poem. Ha, hum sad chaste hair ansi duniya gismo barbari ki batein sirf kitabon tak ya bhashano tak seemit na rahein. Asli zindagi me bhi unka paalan kia jaye

    Liked by 1 person

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