अलविदा 2019!

बीत गयी जो बात गयी, बीती सारी बिसार दे।
आशाओं के फूल खिला और मायूसियों को निथार दे।।

हिम्मत, साहस और विश्वास है सारथी तेरे राह के।
अपनी नियति तू खुद तय कर, सारी आशंकाओं को भुला के।।

नयी डगर है ये, नया आगाज़ है, दस्तक है नए सहर की।
गर कोशिशों में है शिद्दत पूरी तो फिर क्या फ़िक्र मुश्किलों की।।

संजोकर सारी सुहानी यादों को, वादा करते है कुछ और नयी यादें बनाने का।
ससम्मान अलविदा करते है 2019 को और दिल से स्वागत करते है नए साल 2020 का।

नया साल मुबारक आप सभी को।

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Alvida 2019! Welcome 2020! बीत गयी जो बात गयी, बीती सारी बिसार दे। आशाओं के फूल खिला और मायूसियों को निथार दे।। हिम्मत, साहस और विश्वास है सारथी तेरे राह के। अपनी नियति तू खुद तय कर, सारी आशंकाओं को भुला के।। नयी डगर है ये, नया आगाज़ है, दस्तक है नए सहर की। गर कोशिशों में है शिद्दत पूरी तो फिर क्या फ़िक्र मुश्किलों की।। संजोकर सारी सुहानी यादों को, वादा करते है कुछ और नयी यादें बनाने का। ससम्मान अलविदा करते है 2019 को और दिल से स्वागत करते है नए साल 2020 का। #deepikamishra #newyearwishes #alvida2019 #welcome2020 #myaspiringhope #deepikawrites #mommyblogger #Inspirationalblogger #ahmedabadblogger

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©®दीपिका

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https://youtu.be/9VHsoy4Fqas

कद बड़ा या सोच?

शालिनी चुलबुली सी और प्यारी सी एक लड़की थी जो हमेशा हँसती खेलती रहती थी। पढ़ाई में अव्वल, खेल कूद में आगे, घर के कामों में निपुण। सब कुछ परफेक्ट सा था उसका। किसी का दिल दुखाना क्या होता है? उसे पता तक नहीं था, अपनी दुनिया में मस्त एक ज़िम्मेदार लड़की, बस एक ही कमी थी उसमें लोगों के हिसाब से, उसकी हाइट।

हाँ, छोटे कद की थी वो और उसकी इस शारीरिक कमी के लिए उसे न जाने क्या क्या सुनना पड़ता था? मानों उसके हाथ में था ये सब! उसने जानबूझकर अपना कद कम किया हो।

उसकी सारी अच्छाइयों को छिपाने के लिए उसके कद को जरिया बनाया जाता था। उसे जताया जाता था हमेशा की वो छोटी है, उसका मजाक बनाया जाता था कि ये नहीं कर सकती वो, यहाँ नहीं पहुँच सकती वो, ये तो इसके बस का ही नहीं है, वगेरह वगेरह।

शालिनी को बुरा तो बहुत लगता था पर वो उन्हें जवाब देना जरुरी नहीं समझती थी। उसने सोच लिया था कि वह लोगों के तानों का जवाब अपने हुनर से देगी, अपने काम से देगी, उनसे लड़ कर नहीं। जैसे जैसे उसकी उम्र शादी के लायक होती गई लोगों के ताने भी बढ़ गए पर उसने परवाह नहीं की।

धीरे धीरे शालिनी की माँ से भी कहा जाने लगा कि “तुम्हारी लड़की की हाइट तो छोटी है, कोई अच्छा लड़का नहीं मिलेगा तुम्हारी शालिनी को”। शालिनी की माँ भी पलट कर जवाब में बिना हिचके कह ड देती थी कि “क्या कमी है मेरी बेटी में? जो उसकी खूबियों को नहीं समझते उनमें और उनकी सोच में कमी है, मेरी बेटी में नहीं।”

शालिनी की माँ लोगों से तो कह देती थी पर मन ही मन वो भी जानती थी लोगों की सोच को और डरती थी अपनी बेटी के भविष्य को लेकर। उसने कभी भी शालिनी को जाहिर नहीं होने दिया पर शालिनी समझ गयी थी अपनी माँ की चिंता को।

उसने माँ से आगे बढ़कर बात की और उसे समझाया, “माँ आप चिंता मत करो।” जो इंसान मेरे व्यक्तिव से नहीं, मेरे बाहरी रंग रूप से मेरी पहचान करेगा वो ज़िंदगी भर मेरा साथ क्या निभायेगा? मैं जैसी हूँ,वही मेरी पहचान है।

वो आगे बोली, “माँ आपने वो कहावत तो सुनी होगी की “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर? पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।”

मैं अपनी कमी को अपनी ताकत से हरा दूंगी। और तब ही शादी करुँगी जब मुझे, मैं जैसी हूँ वैसे ही स्वीकार किया जाएगा और वो भी सम्मान के साथ, तब तक हम इस बारे में बात भी नहीं करेंगे।

शालिनी लोगों की कही बातों को पीछे छोड़ कर और अपनी माँ को समझाकर अपनी आईएस की परीक्षा की तैयारी में पूरे जोर शोर से लग गयी, “अब उसका एक ही लक्ष्य था अपनी योग्यता से अपने व्यक्तिव की पहचान बनाना ना की अपने कद से।”

रिजल्ट आया तो सब हैरान हो गए, शालिनी ने पहले ही प्रयास में आईएस क्लियर कर लिया था और साथ में ही कर दिया उन सभी लोगों का मुँह बंद जो हमेशा उसे कोसने के लिए ही मुँह खोलते थे।

कुछ ही महीनों में उसने अपने व्यक्तिव से,अपने काम से अपनी एक अलग पहचान बना ली थी और बना ली थी जगह समीर के दिल में भी। समीर शालिनी को अपना जीवन साथी बनाना चाहता था उसकी अच्छाइयों की वजह से न कि वो कैसी दिखती है इस वजह से।

शालिनी बहुत खुश थी कि उसकी खोज पूरी हो गयी उसे वो मिल गया जिसकी सोच उसकी सोच से मेल खाती है।

कैसी लगी आज की कहानी, कमेंट करके जरूर बताये।और अगर अच्छी लगी हो तो फॉलो जरुर करे।

©®दीपिका

ज़िंदगी को जिताना है।

जब भी सुनती हूँ किसी आकस्मिक निधन के बारे में, जिसका ताल्लुक आत्महत्या से होता है तो मन में ढेरों सवाल कौंध जाते है।

सवाल बदलते परिवेश के बारे में, सवाल जो कि मुझे अन्दर तक झकझोर जाते है।

मन सिहर उठता है उन भावनायों के बारे में सोचकर कि क्यूँ किसी ने ऐसा फैसला लिया होगा?

क्यूँ आइडियल ज़िंदगी की परिभाषा को धता बता कर अपना जीवन खत्म कर लिया होगा।

शायद उसे विश्वास हो चलता है कि उसके रहने ना रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

या खुद को वो और घुटता हुआ नहीं देख सकता।

एक कमज़ोर पल उससे क्या से क्या करवा जाता है?

अगर थोड़ी सी हिम्मत दिखाता इस मुश्किल घड़ी में तो शायद खुद को अपनों के बीच में खड़ा पाता।

हम कोई नहीं है किसी की निजी ज़िंदगी में झांकने वाले।

पर अगर बाँट कर दुख कम हो सकता है तो क्यूँ नहीं,हम भी नहीं पीछे हटने वाले।

सवाल उठता है।

क्यूँ हार जाती है ज़िंदगी, मौत की बाहों में?
सब कुछ पाकर भी क्यूँ खो जाती है अंजानी राहों में?

शायद बात कर पाना उसके लिए बहुत मुश्किल होता होगा।
सूझती होगी ना कोई सूरत ना सीरत, हर जख्म दर्द देता होगा।

इंसानी रिश्तों से बढ़कर कुछ नहीं होता।
गर बाँटा होता दर्द उसका भी तो शायद आज वो भी ज़िन्दा होता।

क्यूँ भूल जाते है, बंद किवाड़ों के पीछे भी एक कहानी होती है।
अगर आती सुकून भरी हवा खिड़कियों से तो शायद कुछ और रवानी होती।

बस यही गुजारिश

“हो सके तो हर एक जिंदगी के लिए जीने की कोशिश करे।

हारे खुद को ना, उस गलत सोच को ही हरा दे।”

©®दीपिका

यहाँ देखिये

“रुक जाना नहीं तू कभी हार के”

https://youtu.be/1xWrKHE7dAA

योग्यता

योग्यता क्या है तुझमें? तू ये भली भांति जनता है।
तो फिर क्यूँ पड़ता है गर्दिशों में, अगर सच्चाई को पहचानता है।

दूसरों की कही बातें, हो सकता है छलावा हो।
तू गर खुद में है काबिल इतना तो फिर किस बात का दिखावा हो?

ये तो दुनिया है, कुछ तो लोग कहेंगें ही।
फैसला तुमको करना है कि तुम उलझते हो या बच निकलते हो सादगी के संग ही।

तेरी रूह की सच्चाई को वो भी झुठला ना पाएगा।
तू निकल जाएगा आगे इन दलदलों से और वो हाथ मलता रह जाएगा।

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योग्यता क्या है तुझमें? तू ये भली भांति जनता है। तो फिर क्यूँ पड़ता है गर्दिशों में, अगर सच्चाई को पहचानता है। दूसरों की कही बातें,हो सकता है छलावा हो। तू गर खुद में काबिल इतना तो फिर किस बात का दिखावा हो? ये तो दुनिया है, कुछ तो लोग कहेंगें ही, फैसला तुमको करना है कि तुम उलझते हो या बच निकलते हो सादगी से। तेरी रूह की सच्चाई को वो भी झुठला ना पाएगा। तू निकल जाएगा आगे इन दलदलों से और वो हाथ मलता रह जाएगा। ©®दीपिका #hindikavita #deepikawrites #myaspiringhope #hindikavitaye #hindiwriters #hindiwritersofinstagram #hindipoetry #hindipoetrycommunity #poemoftheday #igwriters #instawriters #hindilovers

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©®दीपिका

Merry Christmas!

Wishing you all Merry Christmas!

The year 2019 is about to end and this is the last festive of this year then we will welcome the new year with lots of hopes!

I wish this Christmas will bring lots of happiness, joy, prosperity, love and lots of healthy opportunities for you.

Cherish every moment with joy!

Thanks and Regards,

Deepika

क्या है ज़िंदगी?

कभी कुछ पाना और थोड़ा खोे देने का नाम है, ज़िंदगी।

तो कभी रूठना और कभी झट से मान जाने का नाम है, ज़िंदगी।।

कभी खिलखिला के हँसना और कभी छोटी बातों पर रो देने का नाम है, ज़िंदगी।

तो कभी आगे बढ़ना और कुछ पीछे छोड़ देने का नाम है, ज़िंदगी।।

कभी पहले लड़ने का और बाद में गलती पर पछताने का नाम है, ज़िंदगी।

तो कभी थोड़ा गुस्सा और कभी ढ़ेर सारा प्यार लुटाने का नाम है, ज़िंदगी।।

कभी खुद उलझ जाना और कभी दूसरों के मसले सुलझाने का नाम है, ज़िंदगी।

तो कभी “रंजिश ए गम” और कभी बेइंतेहा खुशियाँ लुटाने का नाम है, ज़िंदगी।।

कभी मनचाहा मिल जाना और कभी अनचाहे से पीछा छुड़ाने का नाम है, ज़िंदगी।

तो कभी खुद गुम हो जाना और कभी गैरों को गले लगाने का नाम है, ज़िंदगी।।

कभी उड़ती पतंग की तरह आसमां में उड़ने का और कभी कट कर ज़मीन पर गिर जाने का नाम है, ज़िंदगी।

तो कभी हिम्मत हार कर बैठ जाना और कभी दूसरे का हौंसला बढ़ाने का नाम है, ज़िंदगी।।

कभी तपती धूप और कभी ठंडी झाँव का नाम है, ज़िंदगी।

तो कभी फ़क़त जोश का और कभी सब कुछ बिखर जाने का नाम है, ज़िंदगी।।

कभी आँखें चुराना और कभी बाँहे फैला देने का नाम है,ज़िंदगी।

तो कभी मायूसी और कभी यूँ ही मुस्कुरा देने का नाम है, ज़िंदगी।।

ये ज़िंदगी है,कभी किसी का उधार नहीं रखती है।

जो भी मिलता है उसे, सूद समेत वापस कर देती है।।

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/12/28/jindagi-ko-jitana-hai/

©® दीपिका

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https://youtu.be/j0cbn7qYkUM

बंद करो,अब बहुत हो गया।

क्यूँ ये हाहाकार है? क्यूँ चारों तरफ़ मचा चीत्कार है?
क्यूँ अपनी आबरू खोने के बाद भी वो करती इंसाफ़ का इंतज़ार है?

क्यूँ डर है आँखों में उसकी? क्यूँ डरा हुआ और सदमे में उसका परिवार है?
क्या गलती थी उसकी, जो वो चिता पर और खुली हवा में घूम रहे उसके गुनहगार है?

बंद करो, अब बहुत हो गया।
बंद करो, अब बहुत हो गया।

ना समझो उसे भोग की वस्तु,
वो तो किसी की लाड़ली बेटी, बहू, पत्नी और परिवार के जीने का आधार है।

क्यूँ ये हाहाकार है?
क्यूँ चारों तरफ़ मचा चीत्कार है?

ये कैसी विडंबना है? ये कैसा सामाजिक सरोकार है? एक तरफ पूजी जाती है जो कन्या देवी के रूप में नौ दिन, क्यूँ बनती वही उन वैश्यी दरिंदों का शिकार है?

कहाँ जा रहे है हम? क्या ये ही हमारे संस्कार है?

कोई घर से निकलने में डर रही है, तो कोई घर में ही डर के साए में जीने को लाचार है।

क्यूँ ये हाहाकार है?
क्यूँ चारों तरफ़ मचा चीत्कार है?

हर घाव शरीर का, उसकी आत्मा को झलनी कर जाता है।

जीना चाहती हूँ मैं, कहकर दिल का हर दर्द उसकी आँखों में उतर आता है।

बंद करो, अब बहुत हो गया।
बंद करो, अब बहुत हो गया।

ना समझो उसे भोग की वस्तु,
वो तो किसी की लाड़ली बेटी, बहू, पत्नी और परिवार के जीने का आधार है।

कैसे विकृत मानसिकता को बढ़ावा दिया जाता है?

जो जघन्य, क्रूर और बर्बर अपराधी है, कैसे उसकी दया याचिका पर विचार किया जाता है?

जुल्म करते वक़्त जो अपराधी अपनी उम्र का होश खो बैठता है,

बाद में, गलती हो गयी कहकर अपनी उम्र का हवाला देकर सज़ा को कम करने के हजारों रास्तों के द्वार खुलवाता है।

क्या हो गया है हमें, कहाँ जा रहे है हम?

सिर्फ मोमबत्ती लेकर रास्तों पर बैठना समस्या का हल नहीं है, किसी भुलावे में जी रहे है हम।

सोच बदलने की जरुरत है वो लड़कियाँ है, भोग की वस्तु नहीं।

जला कर राख कर देंगी जो अगली बार उठी ऊँगली कोई भी।

बंद करो, अब बहुत हो गया।
बंद करो, अब बहुत हो गया।

ना समझो उसे भोग की वस्तु,
वो तो किसी की लाड़ली बेटी, बहू, पत्नी और परिवार के जीने का आधार है।

©®दीपिका

तमन्ना ए दिल!

रोज़ की मसरूफ़ियत को नज़रअंदाज़ करना चाहता है, ये दिल।
कुछ पल फुर्सत के निकाल कर खुद को खुद से मिलवाना चाहता है, ये दिल।

मस्त परिंदे की तरह आसमां में उड़ने की तमन्ना रखता है, ये दिल।
हजारों ख्वाहिशों को बंद पलकों के तले ज़िन्दा रखता है, ये दिल।

कहीं बार व्यर्थ आशंकाओं से भी भर जाता है, ये दिल।
क्यूँ, कब, कैसे के भंवर में भी फँस जाता है, ये दिल।

सब कुछ पाने की चाहत में कहीं खुद को हार न दूँ, इस डर से भी रूबरू करवाता है ,ये दिल।
पर कैसे सपनों को मंजिल से मिलवाया जाता है, इसका रास्ता दिखाता है, ये दिल।

रोज़ की मसरूफ़ियत को नज़रअंदाज़ करना चाहता है, ये दिल।
कुछ पल फुर्सत के निकाल कर खुद को खुद से मिलवाना चाहता है, ये दिल।

©®दीपिका

छुट्टी वाला संडे?

उमा और निशा बचपन की सहेलियाँ थी, शादी के काफी सालों के बाद दोनों एक दूसरे से मिल रही थी।

चाय की चुस्की लेते हुए उमा ने निशा से पूछा “इस संडे का क्या प्लान है तुम्हारा”? फ्री हो तो मूवी के लिए चलते है?

निशा बात को टालते हुए बोली “नहीं यार, बिल्कुल टाइम नहीं है, बहुत बिजी हूँ।”

उमा सुनकर थोड़ा हैरान हुई, तू मना कर रही है और मूवी के लिए, विश्वास नहीं होता। एक टाइम था तू “फर्स्ट डे फर्स्ट शो” क्वीन के नाम से पूरे कॉलेज में फेमस थी।

“नहीं यार, मना कर दिया ना, नहीं हो पायेगा। क्यूँ बेवजह की ज़िद कर रही है?” निशा से झिड़कते हुए बोला।

“अरे निशा, कौनसा भैया को ऑफिस जाना होता है और बच्चों को स्कूल?” इतना टाइम तो निकाल ही सकती है तू अपने लिए। कौनसा पूरा दिन मांग रही हूँ तुझसे, 3 घंटे की ही तो बात है।

“तेरे लिए तीन घंटे होगें मेरे लिए तो 3 दिन का काम बढ़ जाएगा।”

“क्या हुआ निशा परेशान लग रही है,” उमा ने चाय का कप टेबल पर रखते हुए बोला।

“क्या बताऊँ यार, मेरे लिए हफ्ते के सातों दिन और साल के 365 दिन बराबर है। कोई “संडे”नहीं, कोई छुट्टी नहीं, उल्टा संडे को तो रोज की तुलना में दुगुना काम हो जाता है और कोई हाथ बंटाने वाला नहीं है।”

इतना कहकर निशा रुक सी गई और आँखों की नमी को छुपाने की कोशिश करने लगी।

उमा को समझने में देर नहीं लगी, उसने बात आगे बढाते हुए पूछा कि “क्यूँ उसकी कोई मदद नहीं करता?”

“तू भी ना एकदम झल्ली है, कौन मदद करेगा मेरी?”, मम्मीजी तो अक्सर बीमार ही रहती है, वो तो एक कप चाय भी बनाकर नहीं पीती अपने आप से।ठीक हो तो भी और कुछ परेशानी हो तो बात की अलग है। इनका तो पूरा दिन ही आफिस में निकल जाता है और बचा कौन बच्चे। उनकी उम्र थोड़े ही मदद करवाने की।”

“मैं तो तरस गयी हूँ एक अदद संडे के लिए, किसी को कोई फ़र्क भी नहीं पड़ता कि मुझे भी अपना संडे चाहिए, जब मैं भी देर तक सो सकूँ, सबका मनपसंद नाश्ता और खाना बनाने से छुट्टी मिल सके। मैं भी देर तक बैठकर अपना मनपसंद प्रोग्राम एन्जॉय कर सकूँ।

उमा ने निशा का हाथ अपने हाथ में लिया और समझाते हुए बोली कि “इसमें जितनी गलती उन लोगों की है उससे ज्यादा तुम्हारी है।अपने हक़ की आवाज़ तुम्हें खुद उठानी चाहिए।”

“सबका ख्याल रखना अच्छी बात है पर अपने बारे में सोचना भी उतना ही जरुरी है। सबको ये एहसास करवाना कि तुम सब कुछ कर सकती हो और तुम्हें किसी की मदद नहीं चाहिए, ये भी गलत है।”उमा बोली।

उन्हें भी ये पता लगना चाहिए कि सारी जिम्मेदारियाँ अकेले उठाना कोई मज़ाक बात नहीं है। अगर तुम नहीं बोलती हो तो भी उनका फर्ज़ बनता है कि आगे बढ़ कर पूँछे। उमा लगातार बोले जा रही थी और निशा सुन्न होकर उसकी बातें सुनती ही रही।

उमा तूने तो मेरी आँखें खोल दी कैसे शुक्रिया करूँ मेरी दोस्त,आँसू पोंछती हुई निशा बोली। आज ही मैं सबसे बात करती हूँ और हाँ अगले संडे के लिए टिकट बुक करके रखना, मैं जरुर आऊँगी।

निशा के चेहरे पर मुस्कान थी और उमा अपनी दोस्त को मुस्कुराते हुए देख कर मानों सातवें आसमां पर थी।

https://myaspiringhope.wordpress.com/2019/12/03/sunday-ki-talaash/

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©®दीपिका

संडे की तलाश

एक अदद “संडे” के इंतज़ार में निकल जाता है पूरा “हफ़्ता”।
और “अलसाई आँखें” खुश होने लगती है कि अब”नींद”पूरी होने वाली है।

पर क्या पता उस “पगली” को कि पूरे हफ़्ते की कसर तो “संडे” को ही निकलने वाली है।

बचे हुए “कामों की लिस्ट” और “ढेरों फरमाइशें” अब उसका बेसब्री से इंतज़ार कर रही है।

पर वो भी “चंद सुकून” के पलों की चाहत में अपना “सीक्रेट प्लान” तैयार कर रही है।

पर कहाँ गया मम्मी का संडे?

वो खुद को समझाकर फिर से बचे हुए कामों को समेटने में “व्यस्त” हो जाती है।
और अपने “सीक्रेट प्लान” को भूलाकर फिर से अगले संडे का “इंतज़ार” करने लग जाती है।

©® दीपिका

देखना न भूलें

https://youtu.be/RU-aBEqPD_w