दायरा सोच का।

काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, सोच होती है।

जरुरी नहीं सबको वो राह मिले जो मंजिल को जाती है।

क्यों आँकना अपने हुनर को किसी दूसरे से?

जब खुदा ने हर बंदे को अलग पहचान दी है।

सब में कुछ है बेहतर, सबसे अच्छा, सबसे जुदा।

जिसने भी ढूंढ कर तराश लिया, उसके लिए बन जाता है वो एक दुआ।

जो लोग तोलते है दूसरों की ज़िंदगी को एक पैमाने पर,

शायद वो खुद ही भूल जाते है अपने आग़ाज और पिछले अफ़साने को।

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35 thoughts on “दायरा सोच का।

  1. so well written. I agree never compare your life or situation to anyone else….live your life to the best of your abilities. Kya khoob likhi hai kavita.

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